महाराष्ट्र में भाजपा के विधायक गिरीश महाजन ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने विधानसभा के स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के चयन के लिए ओपन वोटिंग तरीके के नए नियमों की वैधता को चुनौती देते हुए जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की थी, जिसे बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था।
अपनी याचिका में महाजन ने आरोप लगाया है कि 23 दिसंबर 2021 की अधिसूचना अवैध और राज्य सरकार की ओर से महाराष्ट्र विधानसभा अधिनियम 1960 के नियम छह और सात में मनमाने ढंग से संशोधन करते हुए जारी की गई ती। इसके तहत गुप्त मतदान व्यवस्था को ध्वनि मत और हाथ दिखाकर मतदान के खुले तरीके से बदल दिया गया है।
अधिवक्ता अभिकल्प प्रताप सिंह और सिद्धार्थ धर्माधिकारी के माध्यम से दाखिल की गई याचिका में कहा गया है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता गिरीश महाजन की ओर से दाखिल जनहित याचिका नौ मार्च को खारिज कर दी थी। इस पीआईएल में आम जनता पर व्यापक रूप से प्रभाव डालने वाले कानूनों को लेकर कई महत्वपूर्ण शवाल उठाए हैं।
'क्या राज्यपाल के पास विवेकाधीन शक्तियां हैं?'
अपील में यह सवाल भी उटाया गया है कि क्या राज्य विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव की तारीख तय करने के संबंध में राज्य के राज्यपाल के पास विवेकाधीन शक्तियां हैं? क्या किसी राज्य का मुख्यमंत्री अपने मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के बिना भारत के संविधान के तहत प्रदान की गई किसी भी शक्ति का प्रयोग कर सकता है?
'क्या सीएम उपाध्यक्ष का चयन कर सकते हैं?'
याचिका में आगे कहा सवाल किया गया है कि क्या विधानसभा के डिप्टी स्पीकर का चयन मुख्यमंत्री कर सकते हैं? इसमें आगे कहा गया है कि राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के स्वस्थ कामकाज में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। उनके संवैधानिक रूप से स्वतंत्र, निष्पक्ष और गैर-पक्षपाती व्यक्ति होने की उम्मीद की जाती है।