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समंदर की तरह लौटे देवेंद्र फडणवीस: महाराष्ट्र के अगले सीएम पद की दौड़ में सबसे आगे, मिलेगी बड़ी जिम्मेदारी?

Sun, 24 Nov 2024 05:05 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

नागपुर का तोहफा...हमेशा आलाकमान के भरोसे पर खरे उतरे देवेंद्र फडणवीस बतौर अध्यक्ष भाजपा को ‘बड़ा भाई’ बनाया, मौके की नजाकत समझ उपमुख्यमंत्री पद संभाला। सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद कहा था...लौटकर आऊंगा...
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जीत का जश्न : विधानसभा चुनाव में जीत के बाद डिप्टी सीएम फडणवीस ने जलेबी छानी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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महाराष्ट्र में दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके देवेंद्र फडणवीस की छवि बेदाग रही है और भाजपा आलाकमान भी उन पर भरोसा जताता रहा है। यही वजह है कि 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें देश को नागपुर का तोहफा बताया था। इस तोहफे ने उन्हें निराश नहीं किया। तब भाजपा ने 122 सीटें जीतीं और सहयोगी दल शिवसेना को 63 सीटें मिलीं।

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इतिहास में पहली बार
देखा जाए तो यह पहला मौका था जब महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा अपने पुराने सहयोगी शिवसेना को इतने अंतर से पीछे छोड़कर सही मायने में बड़े भाई की भूमिका में आ गई थी। हालांकि, भाजपा ने यह विधानसभा चुनाव मोदी लहर में जीता, लेकिन इसमें बतौर महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष फडणवीस का योगदान काफी ज्यादा था। भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार में वह अगले पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहे। पांच वर्ष बाद 2019 के चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने जीत हासिल की, लेकिन नाराज शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने अलग राह अपना ली और दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ा।

'मै समंदर हूं'....बनी सुर्खियां
उस समय उनका यह बयान काफी सुर्खियों में रहा था-मेरा पानी उतरता देख...मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना, मैं समंदर हूं...लौटकर वापस आऊंगा। इस बार के विधानसभा चुनावों में भाजपा की शानदार जीत के बाद उनका यह बयान फिर वायरल हो रहा है। 2019 में काफी सियासी उठापटक के बाद उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली, लेकिन जून 2022 में शिवसेना के दो-फाड़ होने पर उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी।
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सत्ता एक बार फिर भाजपा के पाले में आई, लेकिन फडणवीस को आलाकमान के कहने पर डिप्टी सीएम का पद संभालना पड़ा। पार्टी को एकजुट रखने और फिर से मजबूत करने के लिए मौके की नजाकत समझ उन्होंने इससे गुरेज नहीं किया और उनके धैर्य का ही नतीजा है कि एक बार फिर महायुति की तरफ से मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार के तौर पर उभरे हैं।

राज्य के दूसरे ब्राह्मण मुख्यमंत्री
फडणवीस 23 नवंबर, 2014 से 28 नवंबर, 2019 तक महाराष्ट्र के सीएम रहे। 2019 में दोबारा सीएम की कुर्सी से उन्हें महज तीन दिन में इस्तीफा देना पड़ा था। वह शिवसेना नेता मनोहर जोशी के बाद राज्य की सत्ता संभालने वाले दूसरे ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे हैं।

पिता से सीखे राजनीति के गुर 
नागपुर के मराठी ब्राह्मण हिंदू परिवार में जन्मे फडणवीस के पिता गंगाधर फडणवीस नागपुर से विधान परिषद सदस्य रहे थे। उन्होंने राजनीति के गुर पिता से ही सीखे। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी उनके पिता को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं।

इमरजेंसी में इंदिरा कान्वेंट जाने से किया इन्कार
फडणवीस की स्कूली शिक्षा इंदिरा कॉन्वेंट में हुई, जिसका नाम तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के नाम पर रखा गया था। आपातकाल के दौरान जनसंघ सदस्य रहे उनके पिता जब सरकार विरोधी प्रदर्शनों के कारण जेल गए तो फडणवीस ने भी इंदिरा के नाम पर बने स्कूल में जाने से इन्कार कर दिया।

एबीवीपी से आए राजनीति में
1989 में आरएसएस की छात्र शाखा एबीवीपी में शामिल हुए और 22 वर्ष की उम्र में पार्षद बने और 27 की उम्र में मेयर बन गए। 1999 में पहले विधानसभा चुनाव में ही जीत हासिल की। इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार नागपुर की दक्षिण पश्चिम सीट पर काबिज हैं।

लोकसभा में हारी 105 विधानसभा सीटें झटकीं
महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन ने उन 105 सीटों पर भी जीत हासिल की है, जो वह लोकसभा चुनाव में विपक्ष महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के हाथों हार गई थी। लोकसभा चुनाव में भाजपा को 9, एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 7 और अजीत पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी को सिर्फ 1 सीट मिली थी। 

विधानसभा सीटों के लिहाज से उसे 125 सीटों पर बढ़त मिली थी, 288 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 145 के आंकड़े से कुछ कम था। एमवीए को लोकसभा में 30 सीटों पर जीत मिली थी। इनमें से 13 सीटें कांग्रेस के पास, उद्धव की शिवसेना के पास 9 और शरद पवार की एनसीपी के पास 8 सीटें थीं। अगर विधानसभा के नजरिये से देखे तो एमवीए 153 सीटों पर बढ़त बनाए था जो बहुमत के आंकड़े से अधिक है।

एक नजर खास बातों पर

  • लोकसभा चुनाव का ट्रेंड विधानसभा चुनाव में बरकार नहीं रहा। महायुति के घटक दलों ने शानदार प्रदर्शन किया है। 2019 में भाजपा को विधानसभा में 105 सीटे मिली थीं, इस बार उसकी सीटें बढ़कर 125 हो गई हैं।  
  • शिंदे की शिवसेना और अजीत पवार की एनसीपी का प्रदर्शन भी शानदार रहा है। शिंदे की पार्टी 40 से बढ़कर 55 सीटों को पार कर गई है। अजीत की पार्टी छह से सीधे 38 सीटों पर पहुंच गई।  
  • महायुति को एमवीए से हारी जिन 105 सीटों पर जीत मिली है उनमें से अकेले भाजपा ने 53 सीटें झटकी हैं। शिवसेना के खाते में 28 और एनसीपी के खाते में 24 सीटें गई हैं। अलग-अलग दलों के हिसाब से देखें तो भाजपा ने कांग्रेस से 26 सीटें छीनी हैं, उद्धव की शिवसेना से 15 और शरद की एनसीपी से 10 सीटें। 
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