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महाराष्ट्र में भाजपा की जीत का मंत्र: संघ को मनाया..., महिलाओं, किसानों व ओबीसी को साधकर पलट दी पूरी बाजी

Sun, 24 Nov 2024 12:11 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

भाजपा ने लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन से सबक लेते हुए खामियों को दूर किया। ठोस रणनीति के साथ चुनावी समर में उतरे, आक्रामक प्रचार से फतह किया मैदान।
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भाजपा की जीत के सूत्र। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों से विपक्षी इंडिया गठबंधन सदमे में है। उसके घटक दल नतीजों को मानने को तैयार नहीं हैं। शिवसेना उद्धव गुट के संजय राउत ने तो कहा भी है कि नतीजे न तो पार्टी और न ही महाराष्ट्र की जनता को स्वीकार हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजों के नजरिये से देखें, तो राउत का बयान बहुत हैरान करने वाला भी नहीं है। जो नतीजे आए हैं, उनकी तो शायद भाजपा ने भी उम्मीद नहीं की होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद इंडिया गठबंधन के दल विधानसभा चुनाव में अपनी जीत को सुनिश्चित मानते हुए जहां आराम की मुद्रा में चले गए थे, वहीं भाजपा ने इसे चुनौती के रूप में लेते हुए उसे पलटने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।

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भाजपा के जीत का मंंत्र..
भाजपा ने कई सुधारात्मक उपाय किए, कुछ योजनाएं शुरू की, विपक्ष के हर रणनीति का काट खोजी। भाजपा ने सबसे पहले अपने मुख्य संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ मतभेदों को दूर किया, जो लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा अध्यक्ष के बयान से उभर आए थे। भाजपा ने संघ के साथ ही उससे जुड़े सभी संगठनों को चुनाव प्रचार के लिए मनाया।

 

महिलाओं, किसानों और पिछड़ा वर्गों पर दांव
विशेष रूप से महिलाओं, किसानों और अन्य पिछड़ा वर्गों तक पहुंचने के लिए। संघ के साथ आने से उसे अपने मुख्य निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की नाराजगी और निराशा दूर करने में मदद मिली। आरएसएस से जुड़े सभी 35 संगठनों ने सक्रिय रूप से भाजपा और उसके सहयोगियों के लिए प्रचार किया, जिससे माहौल उनके पक्ष में झुक गया। भाजपा की कोशिशें रंग लाईं और छह महीने के भीतर उसने बाजी पूरी तरह से पलट दी।

 

लोकसभा की गलतियां सुधारी
भाजपा गठबंधन को लोकसभा चुनाव में राज्य की 48 में से सिर्फ 17 सीटें मिली थीं और वह महाविकास आघाड़ी के बाद दूसरे नबंर पर था। विधानसभा चुनाव में तो उसे ऐसी जीत मिली कि आघाड़ी दूर-दूर तक उसके आसपास भी नजर नहीं आया। संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि हमने चुनाव को गंभीरता से लिया और घर-घर जाकर प्रचार करने के लिए अपने कैडरों को तैनात किया। हमें लोकसभा चुनावों में हुए जाति और धार्मिक ध्रुवीकरण के खतरों का एहसास हुआ।

 

लाडकी बहिन योजना का मिला लाभ
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अच्छी तरह से जानता था कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव उसके लिए करो या मरो के समान है और वह किसी भी तरह की गलती का खतरा मोल नहीं ले सकता। इसलिए उसने गलतियों को पहचान कर दूर करने के लिए युद्ध स्तर पर काम किया। साथ ही पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश से सीख लेते हुए महायुति सरकार ने सबसे पहले अपना प्रमुख लोकलुभावन कार्यक्रम माझी लाडकी बहिन योजना शुरू की, जिसका उसे भारी चुनावी लाभ मिला।

 

महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ी
लाडकी बहिन योजना में 18 से 65 वर्ष की महिलाओं को 1,500 रुपये मासिक भत्ता दिया जाता है और महायुति ने सत्ता में दोबारा आने पर रकम बढ़ाकर 2,100 रुपये करने का वादा किया था। योजनाओं के लाभार्थियों की अनुमानित संख्या 2.25 करोड़ है, जो कुल महिलाओं का 55 फीसदी है। विधानसभा चुनाव से पूर्व इस योजना के तहत पात्र महिलाओं के खाते में 7,500 रुपये आ गए थे। 52 लाख नए मतदाताओं सहित महिला वोटरों में छह प्रतिशत की वृद्धि ने अहम भूमिका निभाई।

 

हिंदू एकता से जातिगणना की काट निकाली
राज्य में जटिल जातीय समीकरणों के साथ महायुति के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को सही रूप देना था। मराठा कोटा कार्यकर्ता मनोज जारंगे-पाटिल के आरक्षण आंदोलन के कारण मराठवाड़ा और उत्तर व पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में मराठों व ओबीसी के बीच तीव्र ध्रुवीकरण हुआ। इससे शरद पवार को लाभ की संभावना थी, पर भाजपा के हिंदू एकता के अभियान ने महायुति के पक्ष में काम किया और जाति के नाम पर दरारों को पाटा। वहीं, सीएम एकनाथ शिंदे ने मराठियों की नाराजगी दूर की।

 

बंटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं...नारे ने दिखाया दम
हिंदू मतों को एकजुट करने के लिए भाजपा ने अपने कट्टर हिंदुत्व के अभियान को आगे बढ़ाने में कोताही नहीं की। यूपी के सीएम और भाजपा के फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ ने बंटेंगे तो कटेंगे का नारा दिया, तो पीएम नरेंद्र मोदी ने एक हैं तो सेफ हैं...को आगे बढ़ाया। संघ व उससे जुड़े संगठनों ने भी इसका समर्थन किया और साधु संतों का एक वर्ग भी इसके समर्थन में आया। नतीजों से साफ है कि ये नारे महायुति के पक्ष में काम कर गए। एमवीए की द्रमुक रणनीति या राज्य के सबसे बड़े ओबीसी समूहों में से एक कुनबियों, दलितों व मुसलमानों को एकजुट करने की कोशिश सफल नहीं हुई।

 

ओबीसी को पक्ष में किया
मराठा आंदोलन से ओबीसी ध्रुवीकरण होने की उम्मीद थी और भाजपा ने एक योजना से 353 समुदायों को एकजुट करने के मिशन पर काम किया। प्रदेश चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने वरिष्ठ नेताओं संग राज्य में ओबीसी को भाजपा से जोड़ने की योजना बनाकर प्रभावी ढंग से लागू किया। ओबीसी की 7 जातियों व उप जातियों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने के लिए आयोग बनाने का प्रस्ताव दिया। इससे आेबीसी महायुति से जुड़े  व 175 सीटों पर नतीजे तय करने में अहम रहे।

 

किसानों तक पहुंच बनाई
महाराष्ट्र की 65 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है। किसानों को न तो महायुति और न ही एमवीए नजरअंदाज कर सकती थी। भाजपा के लिए किसानों की नाराजगी दूर करना बड़ी चुनौती थी, खासकर विदर्भ व मराठवाड़ा में। लोकसभा चुनाव से सबक लेते हुए राज्य के बजट में, सरकार ने 7.5 एचपी तक के कृषि पंपों का उपयोग करने वाले किसानों को मुफ्त बिजली की घोषणा की। फसल ऋण माफी व भावांतर योजना का वादा कर किसानों को महायुति से जोड़ा।

 
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प्याज निर्यात मूल्य घटाया
किसानों के लिए केंद्र ने एक और सुधारात्मक उपाय करते हुए न्यूनतम निर्यात मूल्य हटा दिया और प्याज पर निर्यात शुल्क घटा दिया। प्याज निर्यात पर रोक को भी हटा लिया गया। सोयाबीन तेल, कच्चे पाम तेल व कच्चे सूरजमुखी तेल समेत खाद्य तेल के आयात पर शुल्क बढ़ा दिया गया आैर आधार सीमा शुल्क भी शून्य से बढ़ाकर 20% कर दिया गया। रिफाइंड खाद्य तेलों पर मूल सीमा शुल्क बढ़ाया गया। इन पहलों का किसानों को लाभ मिला आैर वे महायुति के साथ आए।
 
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