बिहार में राजनीतिक झंझावातों से जूझता महागठबंधन एक बार फिर चुनौतियों के घेरे में है। विरोधी वार पर वार कर रहे हैं और राजद-जेडीयू नेता इसकी मजबूती का दावा कर रहे हैं, लेकिन विश्वास की कमी दोनों तरफ है। कोई न इसके टूटने का पुख्ता दावा कर सकता है न कोई इसके बने रहने का।
बहरहाल, दावों और वादों से इतर के हालातों पर गौर करें तो पहली बार यह महागठबंधन चुनौती के घेरे में है। वजह है राज्य के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव का होटल और मॉल घोटाले में नाम आना, जिसमें उनके पिता लालू प्रसाद यादव और मां राबडी देवी भी आरोपी हैं।
ऐसे में नीतीश पर उप मुख्यमंत्री को मंत्रीमंडल से हटाने का दबाव तो है ही उनकी खुद की साख भी दांव पर लग गई है। मुसीबत ऐसी है कि नीतीश न आगे बढ़ सकते हैं और न पीछे हटना उनके लिए आसान होगा।
तेजस्वी को मंत्रीमंडल से हटाते हैं तो भी मुसीबत बड़ी है और न हटाएं तो फिर अभी तक गठबंधन साझीदारों पर उठने वाली उंगली उन तक पहुंच सकती है, जिससे उनकी साफ सुथरी राजनेता की छवि को बट्टा लगना तय है। वैसे अभी सारी निगाहें मंगलवार को होने वाली जेडीयू नेताओं की बैठक पर टिकी हैं।
मंगलवार को होने वाली जेडीयू की बैठक पर टिकी निगाहें
बैठक में ही इस बात पर फैसला हो सकता है कि राजद के साथ लगातार कंटीली होती जा रही गठबंधन की राह पर आगे बढ़ा जाए या नहीं। हालांकि सूत्रों का ये भी कहना है कि नीतीश कुमार इस मुद्दे पर फिलहाल वेट एंड वाच की स्थिति में हैं। वह नहीं चाहते कि किसी भी तरह के आरोप प्रत्यारोपों का ठीकरा उनके सिर फूटे, या उन पर गठबंधन तोड़ने के आरोप लगें। इसी रणनीति के तहत वह पूरे मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं।
हालांकि एक बात ये भी है कि नीतीश की निगाहें केंद्र और उसकी एजेंसियों के अगले कदम पर भी टिकी हैं, जिसके बाद ही लालू परिवार के भविष्य का फैसला होगा।
असल में इस महागठबंधन के बीच नीतीश कुमार इतनी आसान स्थिति में भी नहीं हैं कि एक झटके में कोई फैसला ले सकें। यही वजह है कि वह एक के बाद एक आरोप लगने के बाद भी लालू के दोनों बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं जबकि पूर्व में ऐसे ही मामले सामने आने पर वह कई मंत्रियों को एक झटके में बर्खास्त कर चुके हैं। कुछ ऐसे कदमों के बाद ही नीतीश कुमार की पहचान सुशासन बाबू की बनी थी।
भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भी कार्रवाई करने से हिचक रहे नीतीश
पूर्व में अपनी ही सरकार में परिवहन मंत्री रहे आरएन सिंह जब ऊर्जा विभाग के एक पुराने मामले में घिरे थे तो उन्हें तुरंत पद से हटा दिया गया था जबकि सहकारिता मंत्री रामाधार सिंह की भी भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर छुट्टी कर दी गई थी।
जीतन राम मांझी भी एक घोटाले में फंसने के बाद इस्तीफा देने को मजबूर कर दिए गए थे। लेकिन तमाम आरोपों में फंसने के बाद भी तेजस्वी और उनके भाई तेज प्रताप नीतीश सरकार में जमे हुए हैं।
उसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि नीतीश अगर तेजस्वी या तेज प्रताप को मंत्रीमंडल से हटाते हैं तो उन पर महागठबंधन तोड़ने का आरोप लग सकता है और अगर वह उन्हें सरकार में बनाए रखते हैं तो साफ है कि भ्रष्टाचार को शह देने के आरोपों से उनके लिए जान बचाना मुश्किल हो जाएगा।
हालांकि गठबंधन से हटने की स्थिति में भाजपा बिना शर्त उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार बैठी है लेकिन इस सूरत में राष्ट्रीय राजनीति का पूरा परिदृश्य ही बदल जाएगा। ऐसे में अब सारी निगाहें मंगलवार को होने वाली बैठक पर टिकी है।