पशुओं पर क्रूरता की आए दिन कोई ना कोई घटना सामने आती रहती है। इसी बीच, मद्रास उच्च न्यायालय ने एक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोई उदाहरण देने के लिए किसी जानवर को किसी भी तरह की यातना नहीं दी जानी चाहिए। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एन सतीश कुमार ने यह टिप्पणी विल्लुपुरम जिले के रहने वाले के मुर्थु की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
क्या था मामला
गौरतलब है कि के मुर्थु ने इस साल 11 अगस्त को तिरुवेन्नईल्लूर पुलिस स्टेशन के निरीक्षक के एक आदेश को रद्द करने के लिए एक याचिका दायर की थी। इसमें उसने मांग की थी कि उसे एक भैंस के साथ विरोध प्रदर्शन करने और प्रतीकात्मक रूप से भैंस को एक याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। उसने यह मांग इसलिए की थी कि भूमि अतिक्रमण और विवादों के खिलाफ उसकी शिकायत पर अधिकारी कार्रवाई नहीं कर रहे थे। उसने इस बाबत छह और 11 अगस्त को शिकायत की थी। जिसके बाद के मुर्थु ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
लोकतांत्रिक विरोध के लिए जानवरों के साथ क्रूरता की आवश्यकता नहीं
मामले में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने कहा कि उनका विचार है कि लोकतांत्रिक विरोध करने के लिए जानवरों के साथ क्रूरता करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए, याचिकाकर्ता द्वारा भैंस या किसी अन्य जानवर को ले जाने और सुबह से शाम तक प्रदर्शन के दौरान अपने रखने की प्रार्थना की अनुमति नहीं दी जा सकती है। याचिका को खारिज न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह का कृत्य जानवरों की क्रूरता और पशु क्रूरता रोकथाम अधिनियम का उल्लंघन होगा।
अदालत ने दिया निर्देश
हालांकि अस दौरान याचिकाकर्ता ने अपनी प्रार्थना में बदलाव करते हुए कहा कि उन्हें बिना किसी जानवर के विरोध प्रदर्शन में शामिल किए, लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति दी जा सकती है। इस पर न्यायाधीश ने स्थानीय पुलिस को उसकी याचिका पर विचार करने और पुलिस द्वारा निर्धारित स्थान पर सभी सामान्य शर्तों के साथ आंदोलन करने की अनुमति देने का निर्देश दिया।
बिना मान्यता के चल रहे स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करें : हाईकोर्ट
मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के सलेम जिले में बिना मान्यता के चलाए जा रहे स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। सलेम जिले के एक स्कूल की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अब्दुल कुद्दोज ने ये निर्देश दिया।
न्यायाधीश ने कहा कि यदि प्राधिकारियों के संज्ञान में लाया जाता है कि सलेम जिले में बिना मान्यता के और डीटीसीपी की मंजूरी के बिना स्कूल चलाए जा रहे हैं, तो उन्हें उन स्कूलों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई शुरू करनी होगी। जैसा कि याचिकाकर्ता के स्कूल के लिए किया गया है।