फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गैर-हिंदुओं को नहीं मिलेगा मंदिर में प्रवेश?: मद्रास हाईकोर्ट ने साफ की स्थिति, कहा- परंपरा से समझौता नहीं

Wed, 28 Oct 2026 12:21 PM IST
अमन मौर्या पीटीआई, चेन्नई, तमिलनाडु

सार

मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन या श्रद्धा का संकल्प न लेने वाले गैर-हिंदुओं को आगम मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलेगा। कोर्ट ने राजनीतिक दिखावे और नियमों के उल्लंघन पर भी कड़ी टिप्पणी की है।
विज्ञापन
कोर्ट। (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

मद्रास हाई कोर्ट ने आगम मंदिरों में प्रवेश को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जो गैर-हिंदू श्रद्धा व्यक्त करने का संकल्प लेने या पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करने से इनकार करते हैं, उन्हें आगम मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसा करने से इन मंदिरों की धार्मिक पवित्रता प्रभावित होगी। यह फैसला के थंगम वेंकटेश द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) के बाद आया है, जिसमें 'तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम' को सख्ती से लागू करने और नियमों के उल्लंघन के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी मुरुगन की खंडपीठ ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल आगम मंदिरों पर लागू होता है।
विज्ञापन


ये भी पढ़ें: क्या मशाल मार्च से डरे वीसी?: एसआरएफटीआई प्रशासन और छात्र संघ आमने-सामने, परिसर में दाखिल हुई पुलिस

आगम शास्त्रों में क्या कहा गया?
आगम मंदिर एक ऐसा हिंदू मंदिर होता है जिसे 'आगम शास्त्रों' (प्राचीन ग्रंथों) के अनुसार बनाया जाता है, प्रतिष्ठित किया जाता है और संचालित किया जाता है। इन शास्त्रों में मंदिर से जुड़ी हर छोटी-बड़ी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा मंदिरों में जाने के विषय पर चर्चा करते हुए, खंडपीठ ने राजनीतिक हस्तियों के अलग-अलग रवैये को रेखांकित किया। एक उदाहरण देते हुए, कोर्ट ने बताया कि ईसाई धर्म को मानने वाले मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने मदुरै के प्रसिद्ध मीनाक्षी अम्मन मंदिर में जाने से पहले, वहां के अनिवार्य शपथ-पत्र पर विधिवत हस्ताक्षर किए और फिर पूजा-अर्चना की।
विज्ञापन


सीएम विजय पर क्या बोले?
न्यायाधीशों ने कहा, 'ईसाई धर्म को मानने वाले होने के बावजूद, उनसे हिंदू धर्म अपनाने के लिए नहीं कहा गया। उनसे केवल देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का आग्रह किया गया था। इसे ही हम 'समावेशी दृष्टिकोण' कहते हैं।' उन्होंने इसकी तुलना उन मामलों से की, जहां कुछ लोगों ने स्थापित नियमों को नजरअंदाज कर दिया। खंडपीठ ने राजनीतिक दिखावे और आस्था के प्रदर्शन को लेकर बहुत स्पष्ट और सख्त टिप्पणी की। इसे राजनीतिक चापलूसी करार देते हुए, न्यायाधीशों ने उन गैर-हिंदू राजनेताओं की आलोचना की जो केवल राजनीतिक लाभ के लिए मंदिरों में जाते हैं और दिखावे के तौर पर अपने माथे पर धार्मिक चिह्न लगाते हैं। खंडपीठ ने कहा, 'इस तरह के दिखावे का मकसद वोट हासिल करना है। हमारा मानना है कि मंदिर की परंपराएं और रीति-रिवाज इस तरह की 'चापलूसी' और दिखावे के आगे नहीं झुक सकते।'

ये भी पढ़ें: 'यह एक विश्वासघाती कृत्य है': कांग्रेस पर क्यों भड़के केंद्रीय मंत्री रिजिजू? बोले- देश से माफी मांगे पार्टी
विज्ञापन


नेताओं को कोर्ट ने क्या नसीहत दी?
इसके अलावा, न्यायाधीशों ने हाल ही में हुई एक घटना का जिक्र किया, जिसमें टीवीके विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा शामिल थे। आरोप है कि उन्होंने 'कुम्भाभिषेकम' समारोह के दौरान, सुविधाओं का निरीक्षण करने के बहाने मंदिर के गोपुरम (शिखर) पर चढ़ाई की थी। अदालत ने इस घटना की कड़ी आलोचना की। अदालत ने इस विरोधाभास पर सवाल उठाया कि एक तरफ तो एक नेता यह दावा करता है कि सनातन धर्म को खत्म कर देना चाहिए और दूसरी तरफ वही नेता एक पवित्र अनुष्ठान के दौरान मंदिर के शिखर पर चढ़ जाता है।

अदालत ने उन अन्य राजनेताओं की भी आलोचना की, जो स्थानीय विरोध के बावजूद धार्मिक प्रतीक या टोपी पहनकर पवित्र स्थलों में प्रवेश करते हैं। अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे नियमों को सख्ती से लागू करें। यह सुनिश्चित किया जाए कि पुरानी परंपराओं और मंदिर में प्रवेश से जुड़े नियमों का पूरी तरह से पालन हो और राजनीतिक लाभ के लिए इनसे कोई समझौता न किया जाए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें