लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में युवाओं के प्रदर्शन को लेकर कहा है कि संसद में हर सांसद को कोई भी मुद्दा उठाने का अधिकार है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में तख्तियां दिखाने और नारेबाजी की जगह नहीं है। गुरुवार को नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान बिरला ने संसद में चर्चा के नियमों, सांसदों के अधिकार और महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किसी भी नए महाभियोग प्रस्ताव की जांच निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार की जाएगी।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन पर ओम बिरला ने क्या कहा?
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए हालिया प्रदर्शनों को संसद में उठाए जाने की संभावना पर सवाल पूछा गया तो बिरला ने कहा कि कोई भी सांसद संसद में किसी भी मुद्दे को उठा सकता है। उन्होंने साथ ही कहा कि तख्तियां दिखाना और नारेबाजी करना किसी भी लोकतंत्र में उचित नहीं है। बिरला ने यह नहीं कहा कि ज्ञानेश कुमार से जुड़ा मुद्दा संसद में जरूर उठाया जाएगा। उन्होंने सांसदों के अधिकार और सदन में चर्चा के नियमों को स्पष्ट करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण विषयों पर उचित परामर्श के बाद चर्चा होती है।
संसद में चर्चा के नियम कौन तय करता है?
ओम बिरला ने बताया कि संसद में किन मुद्दों पर चर्चा होगी, इसका फैसला कार्य मंत्रणा समिति करती है। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श और परामर्श के बाद चर्चा कराई जाती है। इसका मतलब है कि सांसदों को मुद्दे उठाने का अधिकार है, लेकिन किसी विषय पर सदन में चर्चा कराने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार चलती है। बिरला ने लोकतंत्र में खुली बहस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की अहमियत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपरा के तहत स्वतंत्र रूप से विचार रखने और चर्चा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
लोकतंत्र और दूसरे देशों में हो रहे प्रदर्शनों पर क्या बोले बिरला?
फ्रांस और कुछ अन्य देशों में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के बारे में पूछे जाने पर बिरला ने कहा कि दुनिया में होने वाली घटनाओं का असर स्वाभाविक रूप से हर देश पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र भारत की जीवंत परंपरा का हिस्सा है और देश में बहस, चर्चा तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। बिरला के मुताबिक, भारत ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे दुनिया को भी लाभ मिल सके। हालांकि, उन्होंने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों पर संसद में चर्चा की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई।
क्या ब्रिक्स संसदीय मंच पर वैश्विक संघर्षों पर चर्चा होगी?
26 और 27 अक्तूबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स संसदीय मंच के बारे में पूछे जाने पर बिरला ने कहा कि दुनिया में चल रहे युद्ध चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वैश्विक संघर्षों पर चर्चा की जाएगी। बिरला के अनुसार, शांति से ही अर्थव्यवस्था और समाज में स्थिरता आ सकती है। उन्होंने आतंकवाद को भी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बताया और कहा कि भारत इस खतरे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद का मुद्दा मजबूती से उठाएगा और दुनिया को बताएगा कि आतंकवाद समाप्त होना चाहिए।
टीएमसी के 20 बागी सांसदों पर क्या बोले ओम बिरला?
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बिरला से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों की सदस्यता खत्म करने की याचिकाओं पर भी सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को सुना जाएगा और सांसदों के जवाब मिलने के बाद फैसले की प्रक्रिया तेज की जाएगी। टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने इन सांसदों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत 20 अलग-अलग याचिकाएं दी हैं। उनका आरोप है कि सांसदों ने दूसरी पार्टी में शामिल होकर स्वेच्छा से टीएमसी की सदस्यता छोड़ दी है। इसलिए उन्हें दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने बागी सांसदों के मामले में क्या कहा था?
23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई थी कि लोकसभा अध्यक्ष 20 बागी सांसदों की सदस्यता खत्म करने की याचिकाओं पर जल्द फैसला लेंगे। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा था कि वह लोकसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की अपनी सीमा से अवगत है, लेकिन मामले का जल्द समाधान करने की बात याद दिलाना चाहती है। बिरला ने कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन भी है। टीएमसी ने आरोप लगाया है कि निर्णय में देरी हो रही है और इस संबंध में शीर्ष अदालत से हस्तक्षेप की मांग की है।
टीएमसी के बागी सांसदों और पार्टी के बीच विवाद क्या है?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के संसदीय दल में बगावत हुई। इसके बाद 20 लोकसभा सांसदों ने घोषणा की कि वे नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए हैं या उसका हिस्सा बन गए हैं। उन्होंने लोकसभा में अलग समूह के रूप में मान्यता मांगी। इन सांसदों को संसद में एनसीपीआई समूह के तौर पर माना गया और उन्होंने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की संसदीय गतिविधियों में भाग लिया। टीएमसी का कहना है कि सांसद उसके चुनाव चिह्न पर जीते थे और उनका दूसरी राजनीतिक पार्टी से जुड़ना दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता का आधार है। वहीं, बागी सांसदों का दावा है कि उनका कदम वैध विलय है। इस मामले में स्पीकर के फैसले का इंतजार है।