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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: मौलिक अधिकारों की रक्षा का जिम्मा निचली अदालतों का भी

Tue, 09 Mar 2021 07:45 AM IST
Jeet Kumar राजीव सिन्हा, नई दिल्ली।

सार

  • मजिस्ट्रेट व ट्रायल कोर्ट आपराधिक न्याय प्रणाली की रक्षा की पहली पंक्ति: सुप्रीम कोर्ट
  • ट्रायल कोर्ट जज और मजिस्ट्रेट को न सुने जाने लायक मामलों शुरुआत में ही निरस्त कर देने चाहिए
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supreme court - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा है कि ट्रायल कोर्ट और मजिस्ट्रेट को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी उतनी ही है जितनी इस देश की सर्वोच्च अदालत को है।

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शीर्ष अदालत ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट जज और मजिस्ट्रेट को न सुने जाने लायक मामलों को शुरुआत में ही या ट्रायल से पहले ही निरस्त कर देना चाहिए, उसे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने का मौका ही नहीं दिया जाना चाहिए। निचली अदालतें न्याय प्रणाली की रक्षा की पहली पंक्ति होते हैं।

जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने अपने एक फैसले में कहा है, भारत में फालतू मुकदमेबाजी रोजाना की नियति नहीं बननी चाहिए। भारतीय अदालतो को जनहित याचिका के अधिकार का दुरुपयोग व विरोधियों को परेशान करने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। न्यायिक वितरण प्रणाली को व्यक्तिगत प्रतिशोध को पूरा करने के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
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शीर्ष अदालत ने 2012 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में पड़ोसियों के मारपीट की छोटी सी घटना से उत्पन्न सभी मामलों का निस्तारण करते हुए ये बातें कहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अन्याय पर अंकुश लगाने के लिए ट्रायल कोर्ट और मजिस्ट्रेटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले को शीर्ष अदालत तक नहीं ले जाना चाहिए था। पीठ ने कहा है कि इस घटना के परिणामस्वरूप एक-दूसरे के खिलाफ कार्यवाही का सिलसिला शुरू हो गया।

दोनों पक्षों के बीच दुर्भावना ने एक पक्ष को तुच्छ और कठोर आपराधिक मुकदमे में बांध दिया। इस तरह की घटना पर खेद व्यक्त करते हुए पीठ ने कहा, एक व्यक्ति जिसे झूठे आमले में फंसाया गया हो वह न केवल वित्तीय क्षति को झेलता है, बल्कि उसे समाज का तिरस्कार और कलंक भी झेलना पड़ता है। उसे अपने मामले की पैरवी करने के लिए एक वकील खोजने और अपना बचाव करने के लिए धन की व्यवस्था करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। 

शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का न्यायिक हस्तक्षेप न केवल जनता का पैसा व न्यायिक समय को बचाएगा बल्कि स्वतंत्रता के अधिकार की भी रक्षा करेगा जो कि प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिला हुआ है।

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