कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच ने एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाले मामले में कहा है कि भारतीय समाज को बालिकाओं के लिए पूर्ण समानता हासिल करने में अभी लंबा रास्ता तय करना है। यह टिप्पणी उस मामले में आई है जिसमें एक महिला ने कथित दहेज प्रताड़ना और बेटी के जन्म के बाद बढ़े उत्पीड़न से तंग आकर अपनी डेढ़ साल की बच्ची की हत्या करने के बाद आत्महत्या कर ली थी।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सत्र न्यायालय ने केवल पति के खिलाफ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (क्रूरता) और 304B (दहेज मृत्यु) के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य माने थे, जबकि महिला के रिश्तेदारों के बयानों को नजरअंदाज कर दिया गया। न्यायालय ने सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया कि ससुराल पक्ष को हिरासत में लेकर, कानून के अनुसार जमानत देने पर विचार किया जाए और इसके बाद सभी आरोपियों के खिलाफ उचित धाराओं में आरोप तय किए जाएं।
'बेटी के जन्म के बाद 20 लाख रुपये की अतिरिक्त दहेज मांग'
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि कई गवाहों के बयान इस ओर इशारा करते हैं कि मृतका को लगातार शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गई। आरोप है कि बेटी के जन्म के बाद ससुराल पक्ष ने 20 लाख रुपये की अतिरिक्त दहेज मांग शुरू कर दी थी, क्योंकि महिला ने पुत्र को जन्म नहीं दिया। वहीं, ससुराल पक्ष की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि अधिकांश आरोप मृतका के पति से जुड़े हैं और घटना के समय वे पोर्ट ब्लेयर में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा कि घटना से पहले किसी प्रकार की दहेज मांग नहीं की गई थी।