लोकसभा चुनाव के मतगणना के बाद प्रमुख गठबंधनों की जीत या हार 3-3 राज्यों के सियासी समीकरण में व्यापक बदलाव लाएगी। भाजपा की अगुवाई वाले राजग की जीत की स्थिति में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और मध्यप्रदेश के साथ-साथ कर्नाटक में कांग्रेस को राज्य की सत्ता बचाने के लिए पसीना बहाना पड़ेगा। वहीं, महाराष्ट्र, गोवा और बिहार में भाजपा के लिए सहयोगियों को साधे रखने की चुनौती होगी। इसके अलावा राजस्थान में दोनों ही परिस्थितियों में सियासी समीकरण में बदलाव आएगा।
दरअसल, लोकसभा चुनाव के नतीजे केंद्र की राजनीति में राजग ही नहीं कांग्रेस शासित कई राज्यों के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों का लिटमस टेस्ट होगा। सपा-बसपा-राजद, राकांपा, टीडीपी, आप सहित कई क्षेत्रीय दल अगर करिश्मा नहीं कर पाए तो इनसे संबंधित राज्यों में विपक्ष की राजनीति में नए विकल्पों की खोज शुरू हो जाएगी। वहीं, बेहतर प्रदर्शन करने पर क्षेत्रीय क्षत्रपों का सियासी कद बढ़ेगा।
ममता का सियासी कद तय करेगा चुनाव
राजग दोबारा सत्ता में आया तो पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी को अपने विधायकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़े रखना कड़ी चुनौती होगी। चुनाव पूर्व ही पार्टी के कई सांसद और विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं। खुद पीएम ने दावा किया है कि टीएमसी के 40 विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। अगर टीएमसी ने बेहतर प्रदर्शन किया तो केंद्र की राजनीति में पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी का कद और बड़ा होगा।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ के सामने दोहरी चुनौती
मध्यप्रदेश में बसपा से समर्थन से बमुश्किल बहुमत हासिल करने वाली कांग्रेस में जहां आपसी खींचतान है, वहीं बसपा लगतार समर्थन वापस लेने की धमकी दे रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के सामने बेहतर प्रदर्शन करने की बड़ी चुनौती है। इस चुनाव के परिणाम ही उनकी सरकार का भविष्य तय करेंगे। अगर राजग दोबारा सत्ता में आया तो कांग्रेस के लिए सरकार बचाने की चुनौती खड़ी होगी।