गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि पाहवा (1996) और सीताकांत मोहापात्रा (2003) समितियों के माध्यम से मापदंड निश्चित करने के प्रयास किए गए थे, लेकिन प्रयास अनिर्णायक साबित हुए।
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने हो समेत कई भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की मांग पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि इन भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस पर विचार करने के लिए कोई निश्चित मापदंड नहीं है।
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गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा, "हो समेत कई भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। भाषाओं को संविधानकी आछवीं अनुसूचि में शामिल करने की कोई निश्चित मापदंड नहीं है। भाषाओं का विकास एक गतिशील प्रक्रिया है। यह सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास से प्रभावित होती है, इसलिए संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भाषाओं के लिए मानदंड तय करना मुश्किल है।"
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उन्होंने आगे कहा, "पाहवा (1996) और सीताकांत मोहापात्रा (2003) समितियों के माध्यम से मापदंड निश्चित करने के प्रयास किए गए थे, लेकिन प्रयास अनिर्णायक साबित हुए। सरकार आठवीं अनुसूचि में भाषाओं को शामिल करने की आवश्यकताओं पर सचेत है। इन्हें ध्यान में रखते हुए ऐसे अनुरोधों पर विचार किया जाना चाहिए।"
नित्यानंद राय ने कहा, "जहां तक हो जैसी भाषाओं के संरक्षण का सवाल है तो सेंट्रल इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडियन लैंगुएजेस और शिक्षा मंत्रालय आदिवासी भाषाओं को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहा है। इसमें व्याकरण, शब्दकोश, लोक साहित्य, स्कूल एंड एडल्ट लिटरेसी प्राइमर्स और विभिन्न भाषाओं में शिक्षा के डॉक्यूमेंट्स तैयार किए जाते हैं।"