क्या है वीवीपैट(VVPAT)
2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए चुनाव आयोग ने वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) जारी किया था। जिस कमरे या कम्पार्टमेंट में मतदाता वोट देने जाते हैं, बैलेटिंग यूनिट और वीवीपैट दोनों उसी कमरे में पांच मीटर की केबल की सहायता से कंट्रोल यूनिट से जुड़े होते हैं।
2009 लोकसभा चुनावों के बाद सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा ईवीएम के प्रयोग के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने मशीनों के टैम्पर प्रूफ नहीं होने की बात को स्विकार किया था। लेकिन इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग को कोई निर्देश नहीं दिए जाने के कारण स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को चरणबद्ध तरीके से वीवीपैट का उपयोग करने और 2019 तक इनको पूरी तरह से स्थापित कर लेने का आदेश दिया।
मतदान के दौरान मतदान इकाई से जुड़ा वीवीपैट वोट डालने पर एक प्रिंटेड स्लिप तैयार करता है, जिसमें मतदाता द्वारा चुनी गई पार्टी का चुनाव चिन्ह, उम्मीदवार का नाम और क्रमांक संख्या की जानकारी छपी होती है। इस स्लिप से मतदाता उसी वक्त यह क्रॉस-चेक कर सकते हैं कि उनका वोट किसे गया है।
हालांकि यह जानकारी केवल सात सेकंड के लिए डिस्प्ले होती है और मतदाता उस पेपर स्लिप को नहीं रख सकता। पर्ची अपने आप ही मशीन से कट कर एक बंद डब्बे में गिर जाती है। बैलेटिंग यूनिट या कंट्रोल यूनिट में तकनीकी गड़बड़ी होने पर वीवीपैट समेत पूरे सिस्टम को बदलना पड़ता है। वहीं यदी केवल वीवीपैट मशीन में खराबी होती है तो उसके स्थान पर दूसरी मशीन लगाई जा सकती है।
2013 में लाई गईं उन्नत एम 3 वोटिंग मशीनें
ईवीएम की सुरक्षा पर तमाम विपक्षी पार्टीयों द्वारा सवाल उठाए गए हैं। इसी बीच साल 2013 में चुनाव आयोग ने ईवीएम का एडवांस एम 3 संस्करण पेश किया, जिसके बाद 2006 से पहले खरीदे गए करीब 9 लाख से भी ज्यादा एम 2 ईवीएम मशीन बेकार हो गए।
चुनाव आयोग के अनुसार नई वोटिंग मशीनें तकनीकि रूप से ज्यादा उन्नत हैं और उनके साथ छेड़छाड़ होने पर काम करना बंद कर देती हैं। नई मशीनों में ऐसी तकनीक है जिससे वे आपस में असली और नकली ईवीएम की पहचान कर सकते हैं। नई मशीनें एक दूसरे से एक नेटवर्क के जरिए जुड़ी हुई हैं। किसी अनाधिकृत निर्माता द्वारा निर्मित मशीन इस नेटवर्क से नहीं जुड़ पाएगी। नई एम 3 वोटिंग मशीनें पुरानी एम 2 मशीनों से ज्यादा तकनीक कौशल हैं लेकिन प्रयोग करने में उनकी तरह ही आसान और सहज हैं।
एम 3 वोटिंग मशीनें एक साथ नोटा समेत 384 उम्मीदवारों के नाम डिस्प्ले कर सकती हैं। एक बैलेटिंग यूनिट में 24 नई मशीनें एक दूसरे से जुड़ी होती हैं, जबकी एम 2 मशीनों में उम्मीदवारों की संख्या 64 और एक बैलेटिंग यूनिट में जुड़ने वाली कुल मशीनों की संख्या 4 होती थी।
ईवीएम के फायदे
- ईवीएम मशीनें मतदान की प्रक्रिया को सरल करती हैं। वोट देने के लिए मतदाता को केवल एक बटन दबाने की जरूरत होती है। बड़े-बड़े बैलेट बॉक्स के मुकाबले इन मशीनों को आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।
- बैलेट पेपर से होने वाले मतदान में अत्यधिक मात्रा में कागज खर्च होते थे, जिसका असर अप्रत्यक्ष रूप से पेड़ों पर पड़ता था। ईवीएम के प्रयोग से चुनाव के दौरान होने वाली पेपरों की बर्बादी पर लगाम लगा है, इसलिए यह पर्यावरण संरक्षण की दृष्टी से भी लाभदायक है।
- आर्थिक दृष्टी से भी ईवीएम मशीनों का प्रयोग बैलेट पेपर से कम खर्चीला होता है। चुंकी यह मशीनें बैटरी से चलती हैं इसलिए बिजली के खपत का खर्च भी बच जाता है।
- इन मशीनों से मतगणना ज्यादा तेजी और आसानी से होता है। मैन्युअल गिनती जो कई दिनों का समय ले लेती हैं, उसके मुकाबले ईवीएम से चुनाव परिणाम कुछ घंटों में निकल जाते हैं ।
राजनीति में घिरता ईवीएम
शुरुआत से ही चुनावों में हारने वाली पार्टियां ईवीएम की सुरक्षा पर सवाल उठाती आई हैं। 2009 लोकसभा चुनावों में यूपीए सरकार के जीत जाने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि ईवीएम सुरक्षित नहीं हैं।
मार्च 2017 में बसपा अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की धमाकेदार जीत होने पर ईवीएम के साथ हेरफेर करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि मतदान के दौरान ईवीएम मशीन के किसी भी बटन को दबाने से भाजपा को ही वोट मिला है।
2017 में ही अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने पंजाब में ईवीएम मशीनों में हेरफेर होने का आरोप लगाते हुए वीवीपैट पर्चियों से चुनाव परिणाम का मिलान करने की मांग की थी। हालांकि जवाब में चुनाव आयोग ने आप को केवल आत्मविश्लेषण कर के पंजाब में पार्टी के प्रदर्शन का विश्लेषण करने को कहा था।
लेकिन बाद में जब चुनाव आयोग ने ईवीएम मशीनों को हैक करने के लिए खुली चुनौती दी, तो कोई भी राजनीतिक दल सामने नहीं आया। बाद में आप ने दावा किया कि यह चुनौती निरर्थक थी क्योंकि चुनाव आयोग अपनी आंतरिक सर्किटरी सहित ईवीएम का पूरा संचालन नहीं दे रहा था।
इसी साल दिसंबर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने पहले चरण के परीक्षण में 3550 वीवीपैट मशीनों के फेल हो जाने की बात कहते हुए चुनाव के दौरान भाजपा के धोखाधड़ी में लिप्त होने का दावा किया था।
इसी बीच यूपी के नगर निकाय चुनावों के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने परिणामों पर कुछ दिलचस्प संकेत दिया जिससे ईवीएम के साथ-साथ भाजपा भी घेरे में आ गई। अखिलेश ने कहा कि जहां भी मतदान के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल किया गया वहां भाजपा ने 15 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि ईवीएम वाले मतदान क्षेत्रों में उसे 46 प्रतिशत वोट मिले।
बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम विवादों से संबंधित एक याचिकी दायर की गई थी, जिसमें हर निर्वाचन क्षेत्र से अव्यवस्थित रूप से चुने गए कम से कम 30 प्रतिशत बूथों के ईवीएम और वीवीपैट मशीनों के परिणामों की संख्या मिलान करने का अनुरोध किया गया था। 7 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस याचिका का जवाब देने का निर्देश दिया।
आगामी लोकसभा चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल तो जारी रहेगा ही, मगर इसके साथ ही उस पर उठने वाले तमाम तरह के सवालों और दावों के सिलसिले को देखना भी दिलचस्प होगा।