सोमवार को हुई प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह के साथ मौजूद उद्धव ठाकरे बहुत सहज नहीं दिख रहे थे। उनका चेहरा पुराने दर्द को बयां कर रहा था। उन्होंने ज्यादा कुछ कहा भी नहीं। पुलवामा हमले का प्रमुखता से जिक्र किया। हालांकि लगता है कि वह अपनी बातें मनवाने में कामयाब रहे। शिवसेना को लोकसभा में 23 सीटें मिली हैं, 2014 में 22 मिली थीं। विधानसभा में दोनों बराबर सीटों पर लड़ेंगी। पिछला विधानसभा चुनाव दोनों ने अलग अलग लड़ा था। लड़ाई और मनमुटाव की वजह सीटों का बंटवारा ही था। तब भाजपा ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं थी, आज आधी सीटों पर राजी हो गई है। यह बताता है कि मौजूदा हालात के मद्देनजर भाजपा को झुकना पड़ा है। शायद वह समझ गई कि अगर मजबूत विपक्ष से लोहा लेना है तो अपना घर मजबूत करना ही होगा।
क्या खोया-क्या पाया
नए समझौते के तहत भाजपा और शिवसेना अगला विधानसभा चुनाव बराबर सीटों पर लड़ेंगी। बहुमत मिलने पर दोबारा रिश्ते की परीक्षा हो सकती है। जिसकी ज्यादा सीटों होंगी सीएम पद पर उसका दावा मजबूत होगा। लेकिन कम सीटें मिलने पर भी शिवसेना का रुख बदल सकता है। भाजपा को फिर नए संग्राम से गुजरना पड़ सकता है। बात फायदे की करें तो लोकसभा चुनाव में इसका लाभ मिलना तय है। दोनों पार्टियां मिलकर बड़े वोट शेयर पर कब्जा कर सकती हैं। जाहिर तौर पर इससे सीटों में इजाफा होगा। शिवसेना, भाजपा की 30 साल पुरानी दोस्त है और ये दोस्ती हमेशा फायदेमंद ही साबित होती रही है।
क्या है संदेश
बहरहाल, लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच भाजपा-शिवसेना के बीच दोबारा हुई दोस्ती महाराष्ट्र में बाकी दलों का खेल बिगाड़ सकती है। महाराष्ट्र में अगर दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ें तो कांग्रेस और अन्य दलों के लिए लड़ाई मुश्किल हो जाएगी। हालिया उपचुनाव में शिवसेना ने अलग चुनाव लड़ा था। भाजपा को नुकसान भी उठाना पड़ा था। शिवसेना आए दिन सामना के जरिए भाजपा और नरेंद्र मोदी को निशाना बना रही थी। इसे देखते हुए लोकसभा चुनाव में शिवसेना के विपक्षी खेमे में जाने के कयास लग रहे थे। लेकिन चुनाव से ऐन पहले बाजी पलट चुकी है। दो पुराने दोस्तों की दुश्मनी खत्म होने से विपक्षी दलों को मायूसी हाथ लगी है।