शीला दीक्षित जितनी सहज और सरल दिखती हैं, राजनीति की चतुराई और बारीकियों में उतनी ही माहिर हैं। 15 साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उन्होंने जहां न तो भाजपा को पनपने दिया वहीं कांग्रेस के अपने विरोधियों को भी न ही चैन की सांस लेने दी। शीला ने राजनीति की शतरंज पर फिर मोहरे बिछाने की तैयारी कर ली है और वह दिल्ली में कांग्रेस को मजबूत दिखाना चाहती हैं। आम आदमी पार्टी से गठबंधन के राजी न होने के पीछे उन्हें ही अपनी पार्टी में भी सबसे बड़ा गतिरोध माना जा रहा है। शीला के करीबी बताते हैं कि गठबंधन करके उत्तर प्रदेश की तरह दिल्ली में कांग्रेस को ऊंट के बल नहीं बिठाना चाहती।
सूत्र का कहना है कि उत्तर प्रदेश में अस्सी के दशक में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार थी। नब्बे के दशक में शुरूआती चुनाव में भी पार्टी की दशा बहुत खराब नहीं थी। लेकिन नब्बे के ही दशक में बसपा के साथ गठबंधन के बाद कांग्रेस राजनीतिक गठबंधन की पार्टी बन गई और धीरे-धीरे प्रदेश का संगठन ऊंट की तरह बैठ गया। अस्सी साल की शीला इस बारीकी को बखूबी समझती है।
क्यों नहीं चाहती शीला गठबंधन
-दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद से शीला दीक्षित ने कभी भी गठबंधन के पक्ष में अपनी राय नहीं दी। वह मानती हैं कि गठबंधन होने का मतलब है आधी या कुछ इससे अधिक की दिल्ली पर चुनाव लडऩा। यानी राजनीतिक ताकत को पहले से घटा हुआ मान लेना। इसका असर पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं पर सीधा पड़ता है।
-लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस है। आम आदमी पार्टी पीछे है। शीला की शुरू से रणनीति रही है कि वह दिल्ली में कांग्रेस को मजबूत दिखाते रहना चाहती हैं। 1998 में भी शीला दीक्षित ने मजबूती के साथ कांग्रेस को खड़ा दिखाकर भाजपा से सत्ता छीनी थी। वह इस रणनीति को बनाए रखने के पक्ष में हैं।
-शीला दीक्षित का मानना है कि 2013 में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की वजह यूपीए-2 सरकार के खिलाफ देश भर में फैलाया गया प्रोपैगैंडा था। कॉमन वेल्थ गेम समेत अन्यको लेकर प्रोपैगैंडा उनकी तत्कालीन सरकार के खिलाफ भी फैलाया गया। शीला का मानना है कि वह दिल्ली की मुख्यमंत्री थी और दिल्ली में केन्द्र सरकार के खिलाफ फैलाएगए प्रोपैगैंडा का असर ज्यादा पड़ा। इसलिए 2013 के विधानसभा चुनाव में नकारात्मक परिणाम आए। जबकि करीब छह साल बीत जाने के बाद उनकी सरकार पर लगे कोईआरोप साबित नहीं हो पाए।
-दिल्ली में 1998-2013 तक हुए विकास कार्य को लोग याद कर रहे हैं। शीला के नेतृत्व वाली तीन सरकार ने राजधानी की सड़कों को जाम से मुक्ति दिलाई और दिल्ली कोमहानगर का रूप दिया। शीला दीक्षित का मानना है कि उन्होंने बहुत ही कठिन समय में कांग्रेस अध्यक्ष की बागडोर संभाली है। उन्हें जनता और पार्टी के नेता, कार्यकर्ता से अच्छा सपोर्ट मिल रहा है।
-दिल्ली में कांग्रेस की सरकार के बाद आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता में आई, लेकिन लोकसभा चुनाव में सात सीटों पर जीत के अलावा भाजपा को कोई बड़ी सफलतानहीं मिली। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि भाजपा ने दिल्ली में अपने संगठन में प्रयोग करके अपनी स्थिति काफी कराब कर लिया है। इसका भी फायदा कांग्रेस को मिलना तय है।