पिछले लोकसभा चुनाव में राजस्थान की जनता से मिले समर्थन के बाद कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अपनी जीत की उम्मीद लिए बैठी थी, लेकिन रुझान से मिल रहे संकेतों ने पार्टी को हैरत में डाल दिया है। लोगों की उम्मीद के बिल्कुल विपरीत जाकर राजस्थान की जनता का आदेश भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जाता दिख रहा है।विधानसभा चुनाव के बाद महज पांच से छह महीने में ही राज्य की स्थिति इतनी बदल गई कि आज एक तरफ भाजपा क्लीन स्वीप करने को तैयार नजर आ रही है, तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस मुश्किल से दो-तीन सीटों पर सिमटती दिख रही है।
चुनाव के दौरान अलवर में हुए गैंगरेप के कारण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को तीखी आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा था। मामले को जितना ज्यादा दबाने की कोशिश की गई, खबर ने उतनी ही तूल पकड़ ली और यह चुनाव का बड़ा मुद्दा बन गया। पुलिस और प्रशासन की लापरवाही के कारण लोगों की नाराजगी का असर चुनाव पर भी पड़ा।
विधानसभा में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर पार्टी में आपसी खींचतान का माहौल बन गया था, जो आगे भी जारी रहा। सचिन पायलट के उपमुख्यमंत्री बनने के कारण उनके समर्थकों में आक्रोश था। इस चुनाव में पार्टी को इसी नाराजगी का नुकसान झेलना पड़ा है।
जातीय गणित के मामले में राजस्थान बहुत दाव-पेंच वाला राज्य है। यहां की जीत में जाति बड़ी भूमिका निभाती है। मीणा और गुर्जर समुदाय के मतदाता यहां निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस के मुकाबले भाजपा किरोड़ी लाल मीणा की मदद से इन वोटरों को साधने में ज्यादा कामयाब रही है।
राजस्थान में दिसंबर 2019 के चुनाव के दौरान एक नारा बेहद लोकप्रिय हुआ था-मोदीजी से बैर नहीं, वसुंधरा की खैर नहीं। इस नारे के माध्यम से राज्य की जनता ने साफ संकेत दिया था कि उन्हें केंद्र की मोदी सरकार से नहीं, बल्कि राज्य की वसुंधरा सरकार से परेशानी है। इसलिए भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को जनता का समर्थन मिला ।