प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी में रोड शो कर रहे हैं। शुक्रवार 26 अप्रैल को वे अपना नामांकन दाखिल करेंगे। लेकिन तमाम चर्चाओं के बाद भी कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने प्रियंका गांधी को नहीं उतारा, और उनकी जगह अजय राय को वाराणसी से अपना उम्मीदवार बनाने की घोषणा कर दी। क्या प्रियंका गांधी को मैदान में न उतारकर कांग्रेस ने मोदी को वाकओवर दे दिया? क्या प्रियंका गांधी पीएम मोदी के सामने चुनाव जीतने की स्थिति में थीं? अगर वे चुनाव न भी जीततीं तो क्या उनकी उम्मीदवारी से कांग्रेस को पूर्वांचल में जमीनी मजबूती नहीं मिलती? इन सवालों पर लोगों की राय अलग-अलग है।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव तरुण चुग ने अमर उजाला से कहा कि प्रियंका गांधी के मैदान में उतरते ही उनके पति के खिलाफ कथित जमीन के घोटाले का मामला सुर्खियां बन जाता। जनता मोदी जैसे देश की सेवा करने वाले व्यक्ति के सामने एक कथित भूमाफिया की पत्नी को मौका क्यों देती। जाहिर है कि प्रियंका गांधी की जमानत जब्त हो जाती जिससे उनकी किरकिरी होती। इससे उनकी भविष्य की राजनीति पर भी नकारात्मक असर पड़ता। इसलिए कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को मैदान में न उतारकर उनकी इज्जत बचाई है।
एक नेता के मुताबिक, भाजपा की राजनीति में ब्राह्मण लगातार हासिये पर जा रहा है। भाजपा के वर्तमान नेतृत्व ने लगातार ओबीसी और दलित केंद्रित राजनीति की तरफ ध्यान केंद्रित किया है। लेकिन सामाजिक समायोजन की इस कोशिश में ब्राह्मणों की सबसे ज्यादा उपेक्षा हुई है। इस बार यूपी में 80 में से सिर्फ 11 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे गए हैं, उनकी संख्या के लिहाज से बेहद कम है। बिहार में भी ब्राह्मण और भूमिहार उम्मीदवार न के बराबर उतारे गए हैं।
कांग्रेस के एक शीर्ष नेता ने कहा कि जब प्रियंका गांधी ने चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी थी तो उन्हें नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतारना चाहिए था। इससे पूरे पूर्वांचल में पार्टी से दूर जा चुके वोटरों को वापस लाने में मदद मिलती।