लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में जाति के नाम पर राजनीति का जोड़-तोड़ शुरू हो गई है। तमाम दल जातियों के नाम पर मतदाताओं को अपने पाले में करने में जुट गए हैं। खास तौर पर ओबीसी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए होड़ मच गई है। इसे लेकर जनसभाओं, रैलियों और अभियानों का सिलसिला तेज हो गया है। 2019 आम चुनाव के मद्देनजर हर पार्टी जाति के नाम पर दांव खेलकर मतदाताओं को लुभाना चाहती है।
पिछड़े वर्ग के वोटरों पर नजर
भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए हो या महागठबंधन, दोनों पक्ष पिछड़े वर्ग के वोटर्स को अपनी तरफ करने में जुटे हैं। इसी के मद्देनजर जनसभाओं, रैलियों का आयोजन का दौर तेज हो रहा है। भाजपा 15 फरवरी को ही पटना में ओबीसी मोर्चा की दो दिवसीय जनसभा कर चुकी है। हालांकि पुलवामा हमले के मद्देनजर इसे रद्द कर दिया गया है।
तेजस्वी का आरक्षण अभियान
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल के नेता, लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव राज्य में बेरोजगारी हटाओ, आरक्षण बढ़ाओ अभियान के तहत प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि पिछड़ों के लिए आरक्षण और बढ़ाया जाए और इसी मुद्दे के सहारे वह आगामी लोकसभा चुनाव में बड़ा दांव खेलना चाहते हैं।
केंद्र सरकार की ओर से सामान्य वर्ग के गरीब लोगों को 10 फीसदी आरक्षण के फैसले के बाद तेजस्वी ने आरक्षण बढ़ाओ अभियान के तहत मंडल राजनीति का दांव खेलकर लोकसभा चुनाव में बड़ी बाजी जीतना चाहते हैं। उनका जोर है कि आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया जाए। न सिर्फ निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू हो बल्कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी, ईबीसी को उनकी जाति में संख्या के हिसाब से आरक्षण मिले।
जेडीयू की कवायद
जनता दल (यू) भी जातीय राजनीति की कवायद में जुटी है। पार्टी पहले ही पूरे राज्य में अति पिछड़ा प्रकोष्ठ का जिलास्तरीय सम्मेलन आयोजित कर पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर चुकी है। सीएम नीतीश कुमार का अति पिछड़ा वर्ग पर खासा प्रभाव भी माना जाता है।