कांग्रेस ने इसी तरह की मदद अमरोहा में अपना उम्मीदवार बदल कर बसपा उम्मीदवार दानिश अली की भी की है। दानिश हाल ही में जद(एस) से बसपा में आए हैं और चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने यहां पहले राशिद अल्वी को उतारा था, लेकिन दानिश अली जो लंबे समय से जद(एस) में पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवेगौड़ा और उनके बेटे एच.डी कुमारस्वामी के बेहद विश्वासपात्र रहे हैं, विपक्षी एकता के प्रमुख सूत्रधार भी रहे हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस जद(एस) गठबंधन सरकार बनवाने और चलवाने, लोकसभा चुनावों में दोनों दलों के बीच समझौता करवाने में उनकी अहम भूमिका थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ भी उनके अच्छे रिश्ते हैं। इसीलिए दानिश की राह आसान करने के लिए कांग्रेस ने राशिद अल्वी को बदलकर सचिन चौधरी को उतार दिया है। अब मैदान में दानिश अकेले उम्मीदवार हैं और सपा बसपा गठबंधन से होने का लाभ उन्हें मिलना तय है।
उधर, कभी पानी पी पीकर भाजपा को कोसने वाली समाजवादी पार्टी की पूर्व सांसद और फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा को अब भाजपा भा गई है और वह न सिर्फ पार्टी में शामिल हो गईं बल्कि बतौर भाजपा उम्मीदवार रामपुर से सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार मोहम्मद आजम खां को टक्कर भी देंगी।जाहिर है जयाप्रदा को भाजपा में उनके करीबी माने जाने वाले सांसद अमर सिंह ने शामिल करवाया है।
तकनीकी रूप से सिंह हैं तो सपा के राज्यसभा सदस्य लेकिन दिलो दिमाग से वह अब पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के मुरीद हैं और पिछले लंबे समय से सपा और उसके अध्यक्ष अखिलेश यादव के प्रति उनकी नाराजगी और तल्खी जाहिर होती रहती है। मोदी के प्रति अपने आदर की वजह से ही अमर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के तमाम शीर्ष नेताओं की तर्ज पर अपने नाम के साथ चौकीदार उपनाम भी जोड़ लिया है।
कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश में बड़ी कामयाबी तब मिली जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और दिग्गज नेता सुखराम अपने पौत्र के साथ फिर कांग्रेस में लौट आए। मंडी लोकसभा सीट पर सुखराम का काफी प्रभाव है। इसका चुनावी फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।
भोपाल से कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ भाजपा किसे उतारेगी यह अभी साफ नहीं है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम मीडिया और सियासी हलके में चर्चा में है। भाजपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी नेतृत्व की यही राय है कि शिवराज ही दिग्विजय का मुकाबला करें, जबकि शिवराज भोपाल में दिग्विजय से उलझने की बजाय अपनी मनपसंद किसी दूसरी सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। वैसे सुषमा स्वराज द्वारा चुनाव लड़ने सेइनकार करने के बाद शिवराज के लिए उनकी पुरानी विदिशा लोकसभा सीट भी खाली है।
पीएम मोदी- अमित शाह- राहुल गांधी
न न करके भाजपा में जाते जाते रह गए जितिन प्रसाद के लखनऊ से कांग्रेस उम्मीदवारी के नाम की घोषणा अभी तक लटकी है। कुछ उसी तरह दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का समझौते का मसला भी आंखमिचौली खेल रहा है। अब राहुल गांधी को इस पर निर्णायक फैसला लेना है।
आम तौर पर युद्ध के मैदान में सेनापति या घोड़ा नहीं बदला जाता लेकिन कांग्रेस ने मुंबई में अपने प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम को उत्तर पश्चिम मुंबई से लोकसभा के लिए मैदान में उतारने के साथ साथ उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से मुक्त करके यह जिम्मेदारी मिलिंद देवड़ा को दे दी है।
चुनावी सियासत इस कदर माहौल पर हावी है कि आम तौर पर संवैधानिक मर्यादा में बंधे रहने वाले राज्यपाल भी सियासी बयान देने लगे हैं। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने खुद को भाजपा कार्यकर्ता बताते हुए दोबारा केंद्र में मोदी सरकार बनाने की अपील की। कुछ इसी तरह मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल सतना में महापौर को वोट जुटाने की तरकीब बताने से परहेज नहीं किया।
उधर सहारानपुर में प्रचार के लिए गए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वहां के कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद को आतंकवादी सरगना मसूद अजहर का दामाद बता डाला और इमरान मसूद को वोट देने का मतलब आतंकवादियों को वोट देना कहकर राष्ट्रवाद के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का कार्ड खेल दिया है। अब चुनाव आयोग राज्यपालों के बयानों और योगी आदित्यनाथ के भाषण का क्या संज्ञान लेता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा।