कई दशकों में संभवत: अपराध की राष्ट्रीय रिपोर्ट पहली बार सार्वजनिक नहीं की गई है। हर साल दिसंबर या उसके बाद के सत्र में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट संसद में पेश की जाती थी। 13 फरवरी को 16 वीं लोकसभा का संसद सत्र खत्म हो गया, मगर यह रिपोर्ट नहीं आई। हैरानी की बात है कि साल 2017 और 2018 के दौरान देश में अपराध कितना बढ़ा, रेप की घटनाएं कम हुई या ज्यादा हुई, मर्डर, चोरी-डकैती, आर्थिक अपराध, बच्चों के साथ अपराधिक घटनाएं, यह सब जानकारी अब एक रहस्य बनकर रह गई है।
सरकार दो साल से एनसीआरबी रिपोर्ट जारी नहीं कर रही है। विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर कई बार सवाल उठा चुके हैं। एनसीआरबी रिपोर्ट में देशभर में होने वाले अपराध का हर छोटा-बड़ा डॉटा समायोजित रहता है। सभी राज्यों से अपराध की विस्तृत जानकारी लेकर गृह मंत्रालय एनसीआरबी से यह रिपोर्ट तैयार कराता है, इसलिए यह नियम बनाया गया था कि वर्तमान समय की अपराध रिपोर्ट एक साल बाद जारी की जाएगी।
एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट के बारे में बात करें तो वह 2016 की है। तीन साल के दौरान कोई भी रिपोर्ट जारी नहीं की गई। सभी राज्यों ने पिछले साल ही अपराध रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज दी थी। इसके बावजूद यह रिपोर्ट संसद तक नहीं पहुंच सकी। एनसीआरबी के सूत्र बताते हैं कि उनके पास सारा रिकॉर्ड है। सरकार जब कहेगी वे रिपोर्ट जारी कर देंगे।
क्या ये रिपोर्ट इसलिए सार्वजनिक नहीं की जा रही हैं
कांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि सरकार ऐसी रिपोर्ट जारी करने से डरती है। वह जानती है कि इससे उनके सुशासन की पोल खुल जाएगी। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, सभी को पता है। भीड़ ने कितने लोगों को पीट-पीट कर मार डाला, यह भी दुनिया से छिपा नहीं है। संसद में जब भी इन मुद्दों पर सवाल पूछते हैं तो सरकार का दो टूक जवाब होता है कि ऐसे मामलों की जानकारी एनसीआरबी नहीं रखता है। केवल एनसीआरबी ही नहीं, न्यूट्रिशन का डेटा 2016 से अटका पड़ा है। उसकी सही जानकारी जनता को नहीं दी जा रही।
इसी तरह एफडीआई का डॉटा 2018 के बाद से सार्वजनिक नहीं किया गया है। अपराध रिपोर्ट 2016 के बाद से रिलीज नहीं की गई है। जेल संबंधी आंकड़े आखिरी बार 2015 में जारी किए गए थे। कृषि आय से संबंधित आँकड़े 2015-16 के बाद से जनता के सामने नहीं आ सके हैं। किसानों की आत्महत्या को लेकर आए दिन मीडिया में खबरें आती रहती हैं, लेकिन सरकार यह रिपोर्ट भी दबाए बैठी है।
रोजगार का कोई स्टीक आंकड़ा सरकार के पास नहीं
सिंघवी का कहना है कि पिछले 5 वर्षों में मोदी सरकार ने रोजगार का एक भी आंकड़ा औपचारिक रुप से प्रकाशित नहीं किया है। अब सरकार का कार्यकाल खत्म हो रहा है, तो सीएमआई की रिपोर्ट आ गई। इसमें बताया गया कि डेढ़ साल में 1.1 करोड़ रोजगार चला गया है। सरकार ने सही स्थिति बताने की जगह इस रिपोर्ट का खंडन कर दिया। खास बात है कि केंद्र सरकार ने ये नहीं बताया कि हमारे आंकड़ों के अनुसार कितने युवाओं को रोजगार मिला है। नीति आयोग के अध्यक्ष को आँकड़े घुमाने की जिम्मेदारी दे दी गई। वे कह रहे हैं कि जब तक उन्हें केन्द्र सरकार से अनुमति नहीं मिलती, ये आंकड़े प्रकाशित नहीं होंगे। पूरा विश्व जानता है कि इन आंकड़ों को प्रकाशित करने के लिए अनुमति की कोई आवश्यकता नही है। सरकार का झूठ हर बार पकड़ा गया है।