लोकसभा चुनाव में रैली करनी है, रोड शो है, कोई नुक्कड़ जनसभा या नामांकन पत्र दाखिल करने के दौरान अच्छी-खासी भीड़ जुटानी है तो चिंता बिल्कुल न करें। चुनावी बाजार में कथित तौर पर सब कुछ उपलब्ध है। 500 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से हर पार्टी के काल्पनिक समर्थक मिल जाएंगे। अगर नेताजी चाहते हैं कि सारा दिन चुनाव प्रचार में उनके साथ लोगों की (काल्पनिक समर्थक) भीड़ बनी रहे तो उसका रेट करीब 700 रुपये है। इस दौरान समर्थकों का खाना-पीना सब नेताजी को ही वहन करना पड़ता है। रोड शो या नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए दो-तीन घंटे तक समर्थक चाहिए तो उनका रेट अलग है। कहीं 300 तो कुछ जगहों पर 250 रुपये में समर्थक मिल जाते हैं। कई बार यह भी होता है कि एक ही दिन में वही समर्थक अलग अलग समय पर दो-तीन राजनीतिक पार्टियों के जुलूस या रोड शो में नजर आ जाते हैं।
इसलिए काल्पनिक समर्थकों की जरूरत पड़ती है
बवाना के इंडस्ट्रीयल एरिया में लेबर कांट्रेक्टर ओम प्रकाश का कहना है कि चुनावी समय में काल्पनिक समर्थक की बात आम है। उन्होंने सवाल पूछने के लहजे में कहा, अब आप ही बताओ कि इतनी गर्मी में कौन वोटर है जो अपना कामकाज छोड़कर नेताजी के रोड शो या जुलूस में पैदल चलेगा। हम तो लेबर को वहां जाने के लिए नहीं कहते, लेकिन वे छोटे ठेकेदारों की मदद से चुनावी माहौल का हिस्सा बन जाते हैं।
कापसहेड़ा में ओल्ड दिल्ली गुरुग्राम रोड पर सुरक्षा एजेंसी एवं लेबर का काम करने वाली एजेंसी के संचालक भी मानते हैं कि चुनाव के समय में लेबर की कमी हो जाती है। खासतौर से निर्माण कार्य प्रभावित होता है। अगर लेबर मिलती है तो वह महंगी होती है। वजह, देर-सवेर किसी न किसी पार्टी के दफ्तर या नेताजी के कार्यालय से फोन आ जाता है कि फलां जगह पर इतने आदमियों की जरूरत है। रेट पांच-छह सौ रुपये ही रहता है।
आईएनए में आकाश देशमुख का भी यही कहना है। वे बताते हैं कि वैसे तो राजनीतिक व्यक्ति के लिए भीड़ जुटाना उसकी सफलता का पैमाना माना जाता है, लेकिन अब काल्पनिक समर्थकों का जो ट्रेंड शुरु हुआ है, उसमें यह आंकलन करना भी मुश्किल हो गया है।
अगर ये करवाया तो 200 रुपये अतिरिक्त चार्ज लगेगा
मजदूर (फाइल)
आजादपुर मंडी में लेबर कांट्रेक्टर महेश्वर दयाल और लक्ष्मी नगर में बाबू लाल राय कहते हैं कि राजनीतिक झलसे या रोड शो में जो भी लेबर जाती है, उनका अपना एक अलग रेट तय होता है। जैसे, कितने घंटे तक कार्यक्रम में रहना है, लगातार झंडा उठाना है, वाहनों के आगे-पीछे चलना है या फिर पार्टी के रंग वाले कपड़े पहनने हैं तो इनका रेट थोड़ा ज्यादा रहता है। 100-200 सौ रुपये अतिरिक्त लगते हैं। कई बार हाथों में बैनर-पोस्टर भी थमा दिए जाते हैं। रैली है तो उसमें कई बार नारेबाजी करनी होती है।
श्रमिक साधु रामजीवन बताते हैं कि चुनाव के समय में लेबर को काम मिलने का संकट नहीं होता है। सामान्य दिनों में हम लेबर चौक पर बैठते हैं तो 50 फीसदी को ही फुल लेबर वाला काम मिल पाता है। यानी एक दिन में आठ घंटे की लेबर मिलती है तो ही 400 रुपये हाथ में आते हैं। अगर 11-12 बजे तक काम मिलता है तो लेबर भी दो-ढाई सौ रुपये मिलती है। चुनाव में फायदा यह रहता है कि खाना-पीना मुफ्त हो जाता है। कभी-कभार रात में पीने को भी मिलता है। कई लोगों को तो एक ही साथ महीने का काम मिल जाता है।
काल्पनिक समर्थक चुनावी दंगल में तो फसल कटाई प्रभावित
सरिता विहार में मुकेश दयाल भल्ला कहते हैं कि आजकल लेबर का संकट चल रहा है। नरेला, नजफगढ़, घेवरा और दिल्ली के दूसरे ग्रामीण इलाकों में गेहूं कटाई चल रही है। अधिकांश जगहों पर अब लेबर द्वारा ही फसल कटाई का काम होता है। चूंकि अब चुनावी समय है तो ज्यादातर लेबर का ध्यान इलेक्शन बुकिंग पर रहता है। इसमें उन्हें फायदा भी है। एक दिन में यदि दो-तीन पार्टियों के रोड शो की बुकिंग होती है तो लेबर को अच्छा पैसा और भरपेट खाना मिल जाता है।
एक राजनीतिक कार्यक्रम खत्म होते ही वे दूसरे दल के कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं। पहले दल की टोपी जेब में और दूसरे दल की नई टोपी सिर पर आ जाती है। चुनाव में व्यस्तता के चलते फसल कटाई में दिक्कत आ रही है। जो लेबर पहले से ही कटाई के कार्य में लगी है, वे ज्यादा पैसे मांगने लगते हैं।
दिल्ली में चुनावी माहौल 12 मई तक चलेगा, लिहाजा उस समय तक कटाई का सीजन खत्म हो जाता है। इस बार लेबर संकट की वजह से किसानों का काम भी प्रभावित हो रहा है।