कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाली किशनगंज सीट पर इस चुनाव में जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से लेकर ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है और कांग्रेस के सामने अपना किला बचाने की चुनौती है।
एआईएमआईएम ने पहली बार यहां प्रत्याशी उतारा है। उसने पूर्व विधायक अख्तरुल इमान को अपना प्रत्याशी बनाया है। 2014 के चुनाव में जदयू ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन मतदान से 10 दिन पहले अख्तरुल ने चुनाव से हटने की घोषणा कर दी, ताकि मुस्लिम वोट न बंटे और भाजपा को हराया जा सके। फिर भी उन्हें 3.88 प्रतिशत वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे।
2009 में जदयू के ही प्रत्याशी को 13.41 प्रतिशत वोट मिले थे, यानी करीब 10 प्रतिशत वोट घटे। इसका फायदा कांग्रेस को हुआ। विजेता बने कांग्रेस के असरारुल हक को 34.29 प्रतिशत वोट मिले थे। वह 2009 में भी विजेता थे, लेकिन तब उन्हें केवल 20.18 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी जदयू के वोट सीधे उन्हें ट्रांसफर हुए।
कांग्रेस नई चुनौतियों से घिरी
भाजपा, जदयू और अब एमआईएम से लड़ते हुए कांग्रेस अपना किला बचाती रही, लेकिन अब नई चुनौतियां झेल रही है। यहां उसके पिछले सांसद असरारुल हक का इंतकाल हो चुका है। उसने किशनगंज सदर विधायक डॉ. मो. जावेद को टिकट दिया है। कांग्रेस को एनडीए के जदयू उम्मीदवार महमूद अशरफ और एमआईएम के अख्तरुल से जूझना है। 16.5 लाख मतदाताओं को लुभाने के लिए कुल 14 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनमें से आठ मुस्लिम हैं।
एआईएमआईएम का उत्तर भारत में पहली जीत का ख्वाब
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इस सीट के सहारे उत्तर भारत में पहली जीत का ख्वाब देख रही है। इसे देखते हुए ओवैसी खुद यहां चुनावी रैली कर रहे हैं। उसके प्रत्याशी अख्तरुल 2015 में एआईएमआईएम में शमिल हो गए थे। पार्टी ने उन्हें 2015 विधानसभा चुनाव में कोचाधामन विधानसभा सीट पर प्रत्याशी बनाया, लेकिन वह हार गए। फिर भी एआईएमआईएम ने उन्हें प्रत्याशी बनाया है क्योंकि आबादी में मुसलमानों की 56 प्रतिशत मौजूदगी है।
इमरान ने तो गड़बड़ कर दी
इमरान खान ‘नेता’ नहीं बन सकता, इसने सब ‘गड़बड़’ कर दिया। बात हुई थी कांग्रेस का समर्थन करने की, और कर दिया भाजपा का। अब विपक्ष को पाकिस्तानी सिद्ध कैसे करेंगे।
- आचार्य प्रमोद कृष्णन, कांग्रेस