भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता विरोधी लहर और स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अपने करीब एक-तिहाई सासंदों का टिकट काट सकती है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भाजपा ने अब तक 2014 में जीतने वाले करीब 71 सांसदों को टिकट ना देने का फैसला लिया है। साथ ही करीब 26 सीटें ऐसी हैं जिनपर अभी भी टिकट का फैसला होना बाकी है।
देशभर में भाजपा 400 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली है और बाकी की बची सीटें वह अपने सहयोगी दलों के लिए छोड़ देगी। यह कहना अभी मुश्किल है कि 2014 में जीतने वाले सांसदों की जगह जिन्हें टिकट दिए गए हैं, वह भाजपा के लिए 2014 जैसी लहर ला पाएंगे या नहीं।
भाजपा को स्थानीय सत्ता विरोधी लहर का भी काफी सामना करना पड़ा है। इससे 2014 में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ था। भाजपा ने भी इसका असर देखा है। एक दशक के दौरान राजनीतिक पार्टियों को स्थानीय इनकमबेंसी या अपने वर्तमान सांसद की अलोकप्रियता की भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
बेशक भाजपा को सत्ता में आए अभी केवल पांच साल हुए हैं लेकिन जहां लंबे समय से उसकी सरकार है वहां सत्ता विरोधी लहर का असर दिख सकता है। हालांकि, पार्टियां हमेशा इस बात से डरती रही हैं कि दरकिनार कर दिए गए नेताओं और उनके संरक्षकों का पलटवार नुकसानदायक हो सकता है जो खुद टिकट बंटवारे को प्रभावित करते हैं।
भाजपा ने यह खतरा इसलिए उठाया क्योंकि अमित शाह को भरोसा है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की संगठनात्मक शक्ति के दम पर असंतुष्ट नेताओं की बगावत को दबाया जा सकता है। जिन सांसदों का रिपोर्ट कार्ड ठीक नहीं है वह शाह और मोदी के नाम पर लड़ेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को यूपी की सहारनपुर रैली में कहा था कि आपका एक-एक वोट सीधे मुझे मजबूत बनाएगा।