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लोकसभा चुनाव 2019: ओडिशा में दो दशकों से सत्ता पर काबिज नवीन पटनायक के वर्चस्व को मिल सकती है चुनौती

Mon, 08 Apr 2019 05:43 PM IST
ललित फुलारा चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ओडिशा आम चुनाव 2019
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ओडिशा में साल 2017 में हुए पंचायत चुनावों में भाजपा ने 849 में से 306 पंचायतों में जीत हासिल की थी। 2012 में उसे केवल 36 सीटों पर जीत मिली थी। बीजू जनता दल (बीजद) 651 से घटकर 460 पर रह गई। भाजपा को मिली बढ़त का बड़ा हिस्सा बीजद से ही आया था। बीते दो दशक में पंचायत चुनाव ऐसे पहले चुनाव माने गए हैं, जिनमें बीजद को भले ही पूर्ण पराजय नहीं मिली, लेकिन नुकसान काफी बड़ा हुआ। और अब, करीब दो वर्ष बाद जब प्रदेश लोकसभा की 21 और विधानसभा की 147 सीटों के चुनावों के लिए जा रहा है, पंचायत चुनाव का परिणाम भावी नतीजों का अंदाजा लगाने का मौका देता है। क्या भाजपा फिर से बीजद को टक्कर दे पाएगी या बीजद ही बाकी पार्टियों को चारों खाने चित करेगी? कांग्रेस इन दोनों के बीच कहां टिकेगी?

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आकलन इसलिए क्योंकि ओडिशा में वर्ष 2000 के बाद एक दशक बीजद-भाजपा, अगले एक दशक बीजद की राजनीतिक सत्ता को टक्कर देने वाला कोई नजर नहीं आया। मौजूदा सीएम नवीन पटनायक ने साल 1997 में अपने पिता बीजू पटनायक के नाम पर बीजद बनाई और 1998 में एनडीए के तहत भाजपा से गठबंधन किया। तीन वर्ष बाद ही प्रदेश की सत्ता हासिल की। करीब 11 साल का साथ 2007 की कंधमाल हिंसा से उपजी खुद नवीन की नाराजगी और 2009 में सीट बंटवारे को लेकर हुए विवाद की वजह से छूट गया। इस अलगाव से बीजद और मजबूत हुई। वहीं, भाजपा इतनी कमजोर हुई कि शून्य पर सिमट गई जबकि 2004 में ओडिशा में उसके सात यानी एक तिहाई सांसद थे। 2014 में प्रचंड मोदी लहर में भी भाजपा सिर्फ एक सीट जीत सकी। वहीं, कांग्रेस 2009 के चुनाव तीसरे मोर्चे की लेफ्ट पार्टियाें के साथ लड़ी। 

भाजपा-बीजद अलग हुए, कांग्रेस झामुमो आए संग

बीजद और भाजपा दोनों अलग-अलग मैदान में उतरी है। कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से गठबंधन कर उसे 1 लोकसभा और 5 विधानसभा सीटें दी हैं। पहले चरण में यहां 4 लोकसभा सीटों पश्चिमी ओडिशा की कोरापुट, नबरंगपुर, कालाहांडी और बहरामपुर में मतदान होना है। पीएम मोदी भवानीपटना, सीएम नवीन पटनायक गंजम और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जयपुर में रैलियां व जनसभाएं कर चुके हैं।

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बीजद का महिला प्रत्याशियों पर दांव

ओडिशा में सत्ता पर काबिज बीजू जनता दल ने लोकसभा के लिए 21 में से सात सीटों पर महिला प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं। यह पार्टी का 33 फीसदी महिला आरक्षण मुद्दे पर पार्टी का समर्थन बताने की कोशिश है। 2014 में बीजद के 20 सांसद बने, इनमें तीन महिलाएं थीं। ऐसे समय में जब भाजपा और कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए एक-एक सीट पर संघर्ष कर रहे हैं, बीजद अध्यक्ष नवीन पटनायक की यह नई राणनीति अलग परिणाम ला सकती है।


कैसी है तीनों दलों की स्थिती?

 

बीजद

बीजद लगातार पांचवीं बार विधानसभा चुनाव में जीत का करिश्मा दोहराने को लेकर आश्वस्त नहीं लग रही। सीएम नवीन पटनायक खुद दो सीटों गंजम जिले में हिंजिली और पश्चिमी ओडिशा में बिजेपुर से मैदान में हैं।  गंजम उनका गढ़ है। वहीं पश्चिमी ओडिशा में विस की 35 और लोकसभा की पांच सीटें हैं। 2014 में चार लोकसभा सीटें बीजद ने जीती थी। लेकिन बड़ा संकट उसके सांसद और विधायकों को तोड़कर भाजपा द्वारा काटे जा रहे टिकट हैं। 

भाजपा

पंचायत चुनावों में दो साल पहले मिली जीत का उत्साह भाजपा में बरकरार है। 68 सीटों वाले विधानसभा में तटीय ओडिशा में भाजपा कमजोर मानी जाती है। वह दूसरे दलों, खासतौर से बीजू पटनायक के समय के नेताओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। बीजद सांसद बिजयंत पांडा, पूर्व मंत्री दामोदर राओत, कोरापुट के पूर्व सांसद व मंत्री रहे जयराम पांगी, सुंदरगढ़ के कुसुम टेटे, नबरंगपुर के सांसद बलभद्र माझी भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं। मोदी-शाह प्रदेश में तूफानी दौरे कर रहे हैं। 

कांग्रेस

चुनावों से ऐन पहले ओडिशा कांग्रेस अपने जिला व राज्य स्तर के नेताओं की नाराजगी से जूझ रही है। एक ओर बीजद की एक तिहाई महिला प्रत्याशी मैदान में है, वहीं महिला प्रत्याशियों को टिकट न दिए जाने से कांग्रेस को अपनी महिला कार्यकर्ताओं का भी गुस्सा झेलना पड़ा। महिला कांग्रेस ने अपने ही पार्टी मुख्यालय पर प्रदर्शन किया अैर तीन दिन बाद अधिकतर सदस्यों व पदाधिकारियों ने इस्तीफे दे दिए। ऐसे हालात में कांग्रेस ने आखिरी समय में प्रत्याशियों को बदला है।

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