शत्रुघ्न सिन्हा को तीसरी बार राज्यसभा देने के लिए पार्टी के शीर्ष स्तर पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन आडवाणी ने नई परंपरा नहीं शुरू होने दी। इसी के साथ लाल कृष्ण आडवाणी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच शानदार राजनीतिक रिश्ता रहा है। आडवाणी प्रधानमंत्री से सहृदय सद्भाव रखते हैं और कहा जाता है कि कभी प्रधानमंत्री मोदी उनकी छाया में काफी सुरक्षित रहे हैं।
क्या सब कुछ ठीक नहीं है?
देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कुछ विसंगतियों का शिकार है तो 1980 में जनसंघ की विरासत पर खड़ी भाजपा भी बदलाव के पड़ाव पर है। भाजपा के दो संस्थापक सदस्य लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया है। दोनों नेता राम मंदिर आंदोलन में शीर्ष भूमिका निभाने वाले रहे हैं। इसके बाद उमा भारती और विनय कटियार भी 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी नहीं है।
लालकृष्ण आडवाणी भाजपा को पार्टी विद ए डिफरेंस का तमगा देते रहे हैं, लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की एक बड़ी तादाद का मानना है कि 2014 के बाद से भाजपा लगातार बदल रही है। बताते हैं आडवाणी को इसका भी दु:ख है।