लोकसभा चुनाव नजदीक हैं। ओडिशा की राजनीतिक फिजाओं में इसकी गर्मी महसूस की जा सकती है। इसके अलावा ओडिशा विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। यहां बीजू जनता दल(बीजेडी) ने 2009 में एनडीए से गठबंधन तोड़ लिया था जिसके बाद से भाजपा को इस राज्य में ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो पाया है।
ओडिशा में भाजपा पहले से ज्यादा मेहनत कर रही है। ओडिशा में भाजपा जीत के लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर चुकी है। ब्लू प्रिंट में पार्टी का मकसद संगठन स्तर पर मजबूती और अधिक लोगों का समर्थन हासिल करना है। ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं।
बीजेडी अध्यक्ष और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने एनडीए से अपना गठबंधन तोड़ लिया था। जिसके बाद भाजपा का संगठन कमजोर हुआ और वह अभी तक राज्य में एक मजबूत टक्कर देने में नाकाम साबित हुई है।
ओडिशा में लोकसभा की 21 सीटें हैं और बीजेडी ने 2014 के लोसभा चुनाव में 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि भाजपा मात्र एक सीट सुंदरगढ़ पर जीती थी, जहां से आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्री जुआल ओरम आते हैं। 2016 में भाजपा स्थानीय निकाय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने में कामयाब रही। जिला परिषद की 849 सीटों में से भाजपा 297 सीटें जीत गईं। बीजेडी दूसरे जबकि कांग्रेस तीसरे नंबर रहीं।
ओडिशा में सीटों का हिसाब
ओडिशा में बीजेडी की सरकार है। राज्य की जनसंख्या 3.18 करोड़ है। 2014 लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और 73.75 फीसदी मतदान हुआ। 2014 में ही हुए ओडिशा विधानसभा चुनाव में 147 सीटों में से बीजेडी 118, कांग्रेस 16, भाजपा 10 और तीन स्वतंत्र उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी।
राज्य के महत्वपूर्ण नेता
राज्य में सबसे लोकप्रिय नेता और मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में नवीन पटनायक को देखा जाता है। वहीं भर्तृहरि महतब(बीजेडी), परसाना आचार्य(बीजेडी) धर्मंद्र प्रधान(बीजेपी), बैजयंत 'जय' पांडा(बीजेपी), अपराजिता सारंगी(बीजेपी), निरंजन पटनायक(कांग्रेस) और नरसिंह मिश्रा( कांग्रेस) भी लोकप्रिय नेताओं की लिस्ट में शामिल है।
महत्वपूर्ण मुद्दे
राज्य के महत्वपूर्ण मुद्दों में किसानों की समस्या, महिलाओं पर बढ़ती यौन हिंसा, सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार के मामले, बेरोजगारी और चिट फंड के पैसे नहीं मिलना है।