प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह (फाइल फोटो)
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याद कीजिए 2009 का चुनाव। यही मई का महीना था और नतीजे आ रहे थे। नतीजों से पहले ज्यादातर अनुमान और विश्लेषण यही कह रहे थे कि भाजपा के तबके लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के मजबूत नेतृत्व के मुकाबले कमजोर मनमोहन नहीं टिक पाएंगे। खुद कई कांग्रेसी भी दबी जुबान से यही मान रहे थे। लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया।
देश ने तब आडवाणी के नाम से ज्यादा मनमोहन के काम पर भरोसा किया था और ज्यादा ताकत दी थी। इतिहास ने फिर खुद को दोहराया है और इस बार विपक्ष के तमाम प्रचार को ठुकरा कर उस नरेंद्र मोदी पर फिर पहले से ज्यादा भरोसा जताया जिनके पास नाम भी है और पांच साल का काम भी।
चुनाव नतीजों के रुझान साफ बता रहे हैं कि जनता ने न विपक्ष की गोल बंदी को स्वीकारा न मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस के आरोपों को। लोगो ने नोटबंदी के दर्द और जीएसटी की उलझन को भूलकर मोदी पर भरोसा किया है। मोदी का बालाकोट राहुल के राफेल पर भारी पड़ा और चौकीदार चोर है की जगह जनता ने चौकीदार प्योर है पर भरोसा किया है।
भाजपा की जीत के लिए निश्चित रूप से मोदी के नाम काम को सबसे ज्यादा श्रेय दिया जाना चाहिए लेकिन अगर दूसरा कोई शख्स इस जीत की बुनियाद में है तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। अगर मोदी के चेहरे ने लोगों में उम्मीद जगाई तो शाह की मेहनत और रणनीति ने इस उम्मीद को हकीकत में बदला। एक-एक सीट का बूथ स्तर तक का प्रबंधन आक्रामक प्रचार सहयोगी दलों से तालमेल और विरोधी पक्ष में सेंधमारी की शाह शैली ने विपक्ष के छक्के छुड़ा दिए।
भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए की सीटें करीब 340 के आसपास आ सकती हैं जो पिछली बार से कुछ ज्यादा हैं। यानी अब जनता ने अपना काम कर दिया है। बारी अब मोदी सरकार की होगी कि वो अब अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को अंजाम देकर उन्हें जमीन पर फलिभूत करे। पिछली बार के पांच साल की तरह अब ये लोग नहीं सुनना चाहेंगे कि पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया।
नई मोदी सरकार के सामने लगातार बढ़ती बेरोजगारी, किसानों की खस्ता हालत, छोटे और मध्यम उद्यमियों और व्यापार को पटरी पर लाने सामाजिक ताने बाने को दुरुस्त करने जैसी कई बड़ी चुनौतियां हैं। साथ ही इस जीत से अति उत्साह में आने वाले हिंदुत्ववादियों के अतिवाद पर भी लगाम लगानी होगी। राम मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दे को सुलझाने के लिए गंभीर और सार्थक प्रयास बेहद सावधानी से करने होंगे। साथ ही बड़ा दिल दिखाते हुए विपक्ष को भी देशहित के मुद्दों से जोड़ना होगा।