वामदलों के 40 में से 39 प्रत्याशियों की जमानत जब्त
अगर वामदलों की बात करें तो वे एक भी विधानसभा क्षेत्र जीतने में नाकाम रहे। वामदलों ने सूबे की जिन 40 सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से 39 सीटों पर उनके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। यह पश्चिम बंगाल के लिए बड़ा बदलाव है। 2014 में सीपीएम ने सूबे की 4 सीटें जीती थीं। पार्टी का वोट शेयर 22.7 फीसदी रहा था जो कि 2019 में सिमटकर 6.3 फीसदी हो गया। सूबे में कांग्रेस के 37 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई। इससे साफ है कि विधानसभा चुनाव में टीएमसी को भाजपा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
2021 से पहले हो सकते हैं विधानसभा चुनाव
ऐसा भी कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में 2021 से पहले विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। नरेंद्र मोदी पहले ही सूबे में अपने चुनाव प्रचार के दौरान दावा कर चुके हैं कि टीएमसी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं। उनका यह दावा ममता बनर्जी सरकार को संकट में खड़ा कर सकता है। इतना ही नहीं टीएमसी से भाजपा में गए अर्जुन सिंह भी हाल ही में दावा कर चुके हैं कि ममता सरकार तीन से छह महीने के भीतर गिर जाएगी क्योंकि टीएमसी के कई विधायक भाजपा के संपर्क में हैं।
टीएमसी ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव सूबे में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था और 26 सीटें जीती थीं। उस वक्त वामदलों के खाते में 15 सीटें आई थी। अगर तब के विधानसभा क्षेत्र में जीत की बात करें तो टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन ने उस वक्त 190 विधानसभा क्षेत्र में जीत दर्ज की थी। दो साल बाद यानी की 2011 में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सूबे में विधानसभा चुनाव लड़ा और पश्चिम बंगाल में 34 साल के लेफ्ट राज का अंत हुआ। लेकिन 2021 में तृणमूल कांग्रेस के लिए भाजपा सूबे में सबसे बड़ा खतरा बन सकती है।