हाईटेक से लेकर ग्राऊंड रूट लेवल तक के चुनाव प्रचार के बावजूद छह चरणों के मतदान में उत्साह का स्तर फीका रहा। 12 बजे दिन तक मतदान का प्रतिशत 30-35 प्रतिशत तक ही रहा। बनारस के कई पोलिंग बूथ के अफसरों ने भी माना 2014 की तुलना में इस बार मतदाताओं में उत्साह कम दिख रहा है। बनारस में डटी चुनाव आयोग की टीम के अफसरों का कहना है कि लगभग पूरे प्रदेश में 2014 के मुकाबले मतदान का स्तर कम रहा है।
उप्र के मुख्य चुनाव अधिकारी एल वेंकेटेश्वर लू का भी मानना है कि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव की तुलना में मतदान उत्साहजनक नहीं रहा है। पूरे प्रदेश का औसत मतदान प्रतिशत 60 प्रतिशत के करीब रहा। लू ने कम मतदान के लिए गर्मी या चिलचिलाती धूप को कारण मानने से इनकार कर दिया।
कुंदन सिंह के अनुसार 2014 में नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रचार अभियान के प्रभारी थे और जनता उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रही थी। इसलिए उत्साह था। 2017 में सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद चुनाव हो रहा था। लोग समाजवादी पार्टी की सरकार से त्रस्त थे। भाजपा नए समीकरण और वादे के साथ मैदान में थी।
कुंदन सिंह कहते हैं कि इस बार तो ऐसा कुछ नहीं था। मतदान करके आने के बाद भी चुनाव का मुद्दा क्या रहा, वह इसे ही नहीं समझ पा रहे हैं। बीएचयू में प्रो. मीनाक्षी सिंह का कहना है कि लोगों को लगना चाहिए कि वह लोकतंत्र का हिस्सा हैं। मुझे नहीं लग रहा है कि लोगों को इसका एहसास हो पा रहा है। दीपक पटेल कहते हैं कि सामान्य और समृद्ध वर्ग मतदान करने बूथ तक नहीं आता। उसे गर्मी लगती है। जबकि बाकी वर्ग जमकर लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है।
बुझारत यादव का कहना है कि इसका कारण चुनाव आयोग है। पहले प्रत्याशी और उसके कार्यकर्ता लोगों को घर से निकालकर बूथ तक ले आते थे। अब चुनाव आयोग जिस तरह से खर्च की सीमा समेत अनेक मानदंड तय किए हैं, उससे मतदान का उत्साह घट गया है।
सपा-बसपा के नेता कम मतदान को गठबंधन के पक्ष में मानते हैं। समाजवादी पार्टी के नेता सुशील दुबे कहते हैं कि यह कोई छिपी बात नहीं है। सबसे अधिक वोट प्रतिशत बसपा का रहता है। दूसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी रहती है। इसके बाद भाजपा को वोट देने वाले मतदाताओं की संख्या रहती है। अंत में कांग्रेस को वोट देने वाले रईस मतदाता घरों से निकलते हैं। उनके घरों का पांच में से औसतन दो या तीन वोट ही पोल हो पाता है।
संजय निषाद इसे दूसरे तरह से समझाते हैं। वह कहते हैं कि एससी, एसटी के बीच में बसपा का कॉडर सक्रिय है। पिछड़ी और अन्य पिछड़ी जाति भी इसे लेकर सक्रिय रहती है। जबकि अपरकास्ट चुनाव में खास रुचि नहीं लेता। संजय निषाद के अनुसार यही वर्ग कांग्रेस और भाजपा का खास वोटर है। मो. जमालुद्दीन बताते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय भी पिछले तीन चार चुनाव से करीब-करीब शत-प्रतिशत मतदान कर रहा है।