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पूर्वांचल में आमने-सामने होंगे मोदी, प्रियंका और अखिलेश ! जीतने वाले के हाथ में होगी सत्ता की चाबी!

Fri, 22 Feb 2019 06:12 PM IST
Amit Digital अमित शर्मा, अमर उजाला
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नरेंद्र मोदी- प्रियंका-अखिलेश
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लोकसभा चुनाव 2019 में उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल सबसे प्रमुख भूमिका निभाएगा। इसके महत्त्व को देखते हुए ही सत्ता के तीनों प्रमुख दावेदारों भाजपा, कांग्रेस और महागठबंधन ने अपने सबसे महत्त्वपूर्ण चहरों को पूर्वांचल से मैदान में उतार दिया है। भाजपा की कमान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में है, तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी को पूर्वांचल जिताने की जिम्मेदारी सौंपी है। खबर है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव की सीट आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं।

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यानी तीन प्रमुख मोर्चे से तीन अहम लोग आमने-सामने होंगे और इसमें उनके नेतृत्व क्षमता को कड़ी चुनौती से होकर गुजरना पड़ेगा। इस रण में जो भी आगे होगा, माना जा रहा है कि अगली सरकार उसके इशारे पर ही बनेगी। अब अहम सवाल है कि पूर्वांचल की जनता इनमें से किस चेहरे पर अपना भरोसा जताएगी?  

एंटी इनकम्बेंसी से भाजपा को पहुंच सकता है नुकसान
इस लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास यह बढ़त है कि उनका राजनीतिक कद राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर काफी बड़ा हो गया है। यह उनके प्रतिद्वंदियों के पास नहीं है। इसका लाभ उन्हें मिलना तय है। केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा जनहित में किये गये काम उनके लिए बोनस की तरह हैं। किसानों की कर्जमाफी, सवर्ण आरक्षण, गन्ना मिल की शुरुआत, काशी-प्रयागराज में किये गये धार्मिक प्रयास और किसानों को प्रतिवर्ष 6000 की सहायता मोदी के लिए वरदान साबित हो सकती है। हालांकि, भाजपा सरकार से जनता की नाराजगी यानी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर भाजपा को यहां नुकसान भी पहुंचा सकती है। हालांकि, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुदेश वर्मा का कहना है कि अभी तक के हर सर्वे में यही बात सामने आई है कि पीएम मोदी का ग्राफ लगातार बढ़ा है। ऐसे में उन्हें नहीं लगता कि इस चुनाव में कोई एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर भाजपा के खिलाफ काम करेगा। भाजपा भले ही इनकार करे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सपा-बसपा के गठबंधन का समीकरण और इसी क्षेत्र से भाजपा के सहयोगियों अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की संभावित नाराजगी उन्हें कमजोर कर सकती है। 
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टिकट न मिलने वाले सपा-बसपा नेता कर सकते हैं भितरघात
अखिलेश यादव के लिए सबसे मजबूत बात यही है कि महागठबंधन का समीकरण उनके पक्ष में जाता है। वे खुद यूपी के मुख्यमंत्री रहे हैं और उन्हें एक स्वच्छ छवि के नेता के तौर पर भी देखा जाता है। सपा सरकार में भ्रष्टाचार के लिए उनकी बजाय उनके अन्य सहयोगियों को दोष दिया जाता है। कार्यकर्ताओं की एक मजबूत पकड़ समाजवादी पार्टी के पास है। इस क्षेत्र में जातिगत समीकरण भी उनके पक्ष में बताया जा रहा है। ऐसी स्थिति में वे यहां के विजेता बन सकते हैं, लेकिन उनके रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन सपा-बसपा के वोटों के ट्रांसफर को लेकर बतायी जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि जिन सपा या बसपा के लोगों को गठबंधन के कारण टिकट नहीं मिल सका है, वे भितरघात कर सकते हैं। दूसरे, सपा और बसपा इन्हीं क्षेत्रों में एक दूसरे से लड़ाई लड़ते रहे हैं। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि नेताओं के बीच हुए गठबंधन को नीचे के स्तर पर कितना कामयाब बनाया जा सकेगा। लखनऊ से सपा नेता राजेन्द्र सिंह के मुताबिक हमने पूर्व में वोटों का ट्रांसफर कराया है। इस बार भी कार्यकर्ताओं को स्थिति की गम्भीरता का एहसास है। वे राष्ट्रीय नेताओं की लाइन देख रहे हैं। केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी दोनों पार्टी के कार्यकर्ता महसूस कर रहे हैं। ऐसे में नेतृत्व के इशारे पर वोटों का ट्रांसफर होना बिल्कुल सामान्य बात है। 

सपा-बसपा को प्रियंका गांधी की वजह से सता रहा है मुस्लिम वोटबैंक खोने का डर
प्रियंका गांधी इस क्षेत्र में एक नई, लेकिन बड़ा चेहरा हैं। कांग्रेस और गांधी परिवार के लोगों के प्रति आकर्षण जनता में अब भी बरकरार है, यह प्रियंका के रोड शो से साबित हो गया है। उनकी सबसे बड़ी मजबूती यही है कि उनके खिलाफ कहने के लिए किसी के पास कुछ नहीं है। प्रियंका गांधी के नाम की घोषणा होते ही जिस तरह से पूर्वांचल के सवर्ण समाज और मुस्लिम समाज में प्रतिक्रिया हुई है, उससे भाजपाई खेमे के साथ-साथ महागठबंधन की नींद भी हराम हो गई थी। प्रियंका के नाम की घोषणा के बाद कई दिनों तक भाजपा नेता यही सफाई देते रहे कि यह वंशवाद की एक और नई पीढ़ी का 'सिंघासनारोहण' है। लेकिन बीजेपी की सधी प्रतिक्रिया बता रही थी कि प्रियंका गांधी को वह हलके में लेने की भूल नहीं कर सकती। वहीं महागठबंधन, जो प्रियंका के नाम की घोषणा होने के पहले उसे पांच सीटें देने को तैयार नहीं था, उसे भी प्रियंका के कारण मुस्लिम वोटबैंक खोने का डर सता रहा है। प्रियंका गांधी के कारण महागठबंधन को पूर्वांचल ही नहीं, पश्चिम में भी नुकसान होने का डर है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या उसके कार्यकर्ताओं की कमी को लेकर है। लम्बे समय से सत्ता में बाहर रहने, गठबंधन की जरूरतों के बीच अपने आधार का विस्तार न कर पाने के कारण पार्टी के पास निचले स्तर पर कार्यकर्ता नहीं हैं। कांग्रेस की यह कमी प्रियंका गांधी की छवि पर भारी पड़ सकती है। 

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