आमतौर पर शहरी और अगड़ों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने वर्तमान लोकसभा चुनाव में इस मिथक को तोड़ दिया। पूर्व की तरह ब्रांड मोदी को मजबूती शहरों ने नहीं, बल्कि गांव-गरीब और किसानों ने दी। पार्टी को इस बार शहर की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में 6 फीसदी अधिक मत मिले। प्रचंड जीत की जमीन मुस्लिम बहुल सीटों पर हुए समानांतर बहुसंख्यक बिरादरी के वोटों के ध्रुवीकरण ने तैयार कर दी। हालांकि बीते चुनाव की तरह इस बार भी पार्टी का कोई मुस्लिम उम्मीदवार जीत नहीं पाया। हिमांशु मिश्र की रिपोर्ट
‘इज्जत घर’ ने रखी प्रतिष्ठा
इस चुनाव में पीएम मोदी का जादू आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के भी सिर चढ़ कर बोला। पार्टी ने पहली बार घोषित किए गए पिछड़े जिलों में अपनी जबर्दस्त उपस्थिति दर्ज कराई। पार्टी को इससे जुड़ी 115 में से 71 (62 फीसदी) सीटों पर सफलता हाथ लगी। विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार के 5 साल के कार्यकाल में जमीन पर उतारी गईं गरीबपरक 134 योजनाओं का सीधा लाभ मिला। खासतौर पर शौचालय निर्माण योजना (इज्जत घर), मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन के लिए उज्ज्वला योजना और पीएम आवास योजना, गांव-गांव बिजली योजना मास्टरस्ट्रोक साबित हुईं। इसके अलावा किसान सम्मान योजना ने भी गांवों में पार्टी को नया आधार दिया।
शहर से ज्यादा गांव में जलवा
पार्टी ने अपनी स्थापना के बाद पहली बार अपनी सीटों का आंकड़ा 300 के पार पहुंचाया है। इसमें ग्रामीण भारत ने अहम भूमिका निभाई। शहरी पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने ग्रामीण भारत की 353 में से 207 सीटों (58 फीसदी) पर कब्जा जमाया। इसके उलट 108 शहरी सीटों में से 58 (करीब 53 फीसदी) सीटों पर जीत दर्ज की। महानगरों की 82 में से महज 40 सीटें भाजपा ने जीती जो करीब 50 फीसदी है। महानगरीय क्षेत्रों की इन सीटों में से 28 कांग्रेस और 14 अन्य दलों ने जीतीं।