सातवें चरण के चुनाव मतदान में केवल छह दिन और चुनाव प्रचार के लिए चार दिन शेष बचे हैं। केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा अपनी सीट बचाने के लिए आखिरी दम लगा रहे हैं। शायद ही गाजीपुर संसदीय क्षेत्र का कोई हिस्सा हो जहां चुनाव की घोषणा होने के बाद से मनोज सिन्हा कई चक्कर न लगा चुके हों, लेकिन जातिवाद की हवा ने उनके संसदीय क्षेत्र को विकास की राजनीतिक प्रयोशााला बना दिया है। विरोधी भी मानते हैं मनोज सिन्हा ने सांसद रहते हुए बहुत काम कराया है। सपा नेता ओम प्रकाश सिंह के परिवार के लोगों को भी सुहेलदेव एक्सप्रेस समेत तमाम रेलगाड़ियां चल पाने की पहले उम्मीद नहीं थी। सब मानते हैं मनोज सिन्हा ने किया बहुत है, लेकिन लड़ाई भी मुश्किल है।
रमेश राजभर का कहना है कि यदि ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव पार्टी अलग न हुई होती तो मनोज सिन्हा चुनाव जीत जाते। हालांकि रमेश का कहना है कि वह विरोधियों पर भारी हैं, लेकिन जीत के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। सिन्हा एक जमीनी नेता हैं। बीएचयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। राजनीति करनी आती है। प्रधानमंत्री भी उनके लिए प्रचार करने आए थे, लेकिन पूरा समीकरण यादव मतों पर टिका है।
अखिलेश राय कहना है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के गाजीपुर में कदम रखते ही सिन्हा की मुसीबत बढ़ जाएगी। शिवेन्द्र सिंह का कहना है कि गाजीपुर का चुनाव यदि प्रधानमंत्री पद के चेहरे और विकास को लेकर हो रहा हो तो मनोज सिन्हा ही अगले सांसद होंगे। इसके साथ वह लेकिन भी लगाते हैं। कहते हैं चुनाव में जातिगत समीकरण प्रभावी हो रहा है।
अष्टभुजा उपाध्याय का कहना है कि मनोज सिन्हा को ब्राह्मण, भूमिहार, गैर जाटव, गैर यादव, गैर अल्पसंख्य का वोट मिल रहा है। क्योंकि उन्होंने काम किया है। अष्टभुजा का कहना है कि आजादी के बाद इतने कम समय में मनोज सिन्हा विकास की सबसे बड़ी गंगा बहाई है। उन्हें अन्य वर्ग के भी लोग वोट दे सकते हैं। लेकिन जब बात जातिगत चुनाव की आती है तो अष्टभुजा गहरी सांस लेते हैं। उनका कहना है कि यही उत्तर प्रदेश का रोना है। नरेश कुमार भी मानते हैं मनोज सिन्हा ने बहुत काम किया है, लेकिन उनका कहना है कि जब अपनी जाति को मतदान कर रहे हैं तो वह भी बसपा को ही बेहतर मानते हैं।
अफजाल अंसारी के पक्ष में है जातिगत समीकरण
हालांकि 2014 का चुनाव मनोज सिन्हा के 32452 मतों से जीते थे। उन्होंने सपा प्रत्याशी शिवकन्या कुशवाहा को हराया था। तब बसपा भी चुनाव लड़ रही थी और प्रधानमंत्री मोदी की लहर चल रही थी। इस बार मनोज सिन्हा का काम बोल रहा है। नरेंद्र मोदी की छवि है, लेकिन सरकार विरोधी लहर भी है। उनके संसदीय क्षेत्र में अच्छी संख्या में मौजूद राजभर भाजपा के खिलाफ हैं। हालांकि बिंद समाज साथ है। ऊपर से प्रत्याशी के तौर पर सपा-बसपा ने अफजाल अंसारी को उतारा है।
अफजाल अंसारी के परिवार को गाजीपुर के भूमिहार अच्छी नजरों से नहीं देखते, लेकिन अन्य में उन्होंने सेंध लगा रखी है। परिसीमन के बाद गाजीपुर संसदीय सीट के करीब ढाई लाख भूमिहार बलिया संसदीय सीट में चले गए हैं। इस तरह से अफजाल अंसारी के पास सबसे बड़ा सहारा अपनी छवि के साथ-साथ सपा और बसपा के ठोस वोट बैंक का भी है।
मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी को इस गणित में जीत पक्की दिखाई पड़ रही है। वहीं राम सकल यादव का कहना है कि यादव, जाटव, मुसलमानों का एकमुश्त मतदान यदि अंसारी के पक्ष में हुआ तो अगले सांसद वहीं होंगे। हालांकि राम सकल का कहना है कि काम के आधार पर तो मनोज सिन्हा को ही चुनना चाहिए। इसी के साथ वह यह भी कहते हैं कि ऐसा हो पाना थोड़ा संशय भरा है।