आंध्र प्रदेश के विभाजन को लेकर भूख हड़ताल
जगन के खिलाफ कई केस दर्ज किए गए और वो जेल में भी रहे। आंध्र प्रदेश को विभाजित करने का फैसला जब यूपीए सरकार ने लिया तब वह जेल में ही भूख हड़ताल पर बैठ गए। 125 घंटे की भूख हड़ताल के बाद उनका शूगर और ब्लड प्रेशर का स्तर तेजी से नीचे चला गया। सरकार ने उन्हें उस्मानिया अस्पताल में भर्ती कराया। जगन की मां और विधायक विजयम्मा ने भी राज्य के विभाजन के खिलाफ भूख हड़ताल की।
जेल से निकलने के बाद जगन ने तेलंगाना के गठन के खिलाफ 72 घंटे का बंद का आह्वान किया। जगन और विजयम्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 2014 में राज्य के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा। आंध्र की 175 में से वाईएसआर कांग्रेस 67 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। जगन को विपक्ष के नेता की भूमिका मिली।
पदयात्रा से लोगों से जुड़ाव
6 नवंबर 2017 को उन्होंने 'प्रजा संकल्प यात्रा' की शुरुआत की जिसमें उन्होंने आंध्र प्रदेश में 3648 किलोमीटर की यात्रा पूरी की। 430 दिनों तक यात्रा 13 जिलों में चली और इसमें 125 विधानसभा क्षेत्र शामिल थे। यह यात्रा 9 जनवरी 2019 को समाप्त हुई। इस यात्रा के दौरान 'हम जगन चाहते हैं, जगन को आना चाहिए' नारा गूंजा। 3648 किलोमीटर की यात्रा के दौरान लोगों के बीच उनको लेकर उत्साह देखने को मिला।
कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने केंद्रीय मंत्री बनना बेहतर नहीं समझा बल्कि वह उचित मौके पर मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं तलाश रहे थे। वह दृढ़ता से अपने मकसद में लगे रहे और किसी भी स्थिति में नहीं झुके। ऐसी क्षमता उनके समकालीन राजनीतिज्ञों में कम ही है।
जगन में बहुत सी विशेषताएं हैं, वह कार्यकर्ताओं को नेतृत्व देते हुए उनमें उत्साह भरते हैं। पार्टी बनाने के कम समय बाद ही उन्होंने चुनावों का सामना किया और उसमें उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा।
पार्टी कैडरों की झुंझलाहट और दूसरे दलों की अदला-बदली के बाद जगन ने कुछ शर्तें भी बनाईं। उन्होंने कहा कि अगर कोई दूसरी पार्टी का उम्मीदवार चुनाव जीतता है और उनकी पार्टी में शामिल होना चाहता है तो उसे इस्तीफा देकर उनकी पार्टी में आना होगा।
वह इस सिद्धांत को बनाए हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह नीति राजनीतिक दलों के लिए आदर्श है। जगनमोहन रेड्डी की उम्र को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि वह ऐसे नेता हैं जिन्हें राजनीति में एक लंबा रास्ता तय करना है।