Mamata Banerjee assumes the charge of the Minister for Coal Mines in 2004
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बचपन में ही ममता के सिर से पिता का साया उठ गया था। स्वतंत्रता सेनानी पिता की मृत्यु के बाद अपने छोटे भाई-बहनों के लालन-पालन के लिए मां अकेली पड़ गईं तो ममता को दूध बेचने का काम भी करना पड़ा था। कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज से ममता बनर्जी ने इतिहास में ग्रेजुएशन किया और फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से इस्लामिक इतिहास में मास्टर डिग्री की। इसके बाद श्रीशिक्षायतन कॉलेज से बीएड और फिर कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की।
पढ़ाई के दौरान राजनीतिक इंट्री, पहली जीत के साथ बनी सबसे युवा सांसद
ममता बनर्जी अपनी पढ़ाई के दौरान से ही राजनीति से जुड़ी हुई हैं। 70 के दशक में जब वह कॉलेज में पढ़ रही थीं, तब उन्हें राज्य महिला कांग्रेस का महासचिव बनाया गया था। 1976 से 1980 तक वे महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। 1984 में ममता ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराने के बाद वह देश की सबसे युवा सांसद बनीं।
1997 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ा और अपनी अलग पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। उनके नेतृत्व में बहुत कम समय में टीएमसी राज्य की वाम सरकार के विपक्ष में सशक्त होकर खड़ी हो गई। पश्चिम बंगाल से लेफ्ट को उखाड़ फेंकने वाली ये वही ममता बनर्जीं हैं, जो आज पीएम मोदी और शाह के बरक्स आ खड़ी हुई हैं। अब देखना यह होगा कि विपक्ष के जो सारे दल आज ममता के साथ खड़े दिख रहे हैं, उन्हें विपक्ष का नेतृत्व करने वाली नेता के तौर पर ममता कितना स्वीकार्य होंगीं!