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खजुराहो: भाजपा-कांग्रेस ने बदली रणनीति, 20 साल बाद ये समीकरण लाएंगे नया नतीजा?

Sun, 05 May 2019 05:49 PM IST
Prachi Priyam चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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खजुराहो लोकसभा चुनाव - फोटो : Amar Ujala
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मध्य प्रदेश की खजुराहो लोकसभा सीट पर इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। वैसे तो यह सीट एक समय भाजपा नेता उमा भारती का गढ़ रही है, लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनो ही पार्टियों के लिए यह प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है। इस बार भाजपा ने जातीय समीकरण के आधार पर अपना नया उम्मीदवार उतारा है, वहीं कांग्रेस भी यहां से नए चेहरे पर दांव लगा रही है। साल 1977 के बाद से इस सीट पर 11 आम चुनाव हुए, जिनमें सात बार भाजपा, एक बार भारतीय लोकदल और तीन बार कांग्रेस को जीत मिली है। यहां से उमा भारती के अलावा कांग्रेस की विद्यावती चतुर्वेदी, उनके बेटे सत्यव्रत चतुर्वेदी, नागेंद्र सिंह और रामकृष्ण कुसमारिया और भारतीय लोकदल से लक्ष्मीनारायण नायक भी सांसद चुने जा चुके हैं। 

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आइए जानते हैं खजुराहो के चुनावी समीकरण, सियासी गणित और इस साल के महामुकाबले के बारे में-
 

चुनावी समीकरण- पिछड़े वर्ग की है निर्णायक भूमिका 

जातीय समीकरण के हिसाब से खजुराहो लोकसभा सीट पर पिछड़ा वर्ग चुनावी नतीजे प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाता रहा है। लगभग 13.5 लाख मतदाताओं वाले इस संसदीय क्षेत्र में साढे़ तीन लाख मतदाता ब्राह्मण वर्ग के हैं। इसके अलावा आरक्षित वर्ग के मतदाताओं की संख्या 45 प्रतिशत से अधिक है। शुरूआत से ही यहां के चुनावों में जातिगत समीकरणों का खासा प्रभाव रहा है। यहां पिछड़े और ब्राह्मण वर्ग के उम्मीदवारों की जीत का रास्ता तो आसान है, लेकिन क्षत्रिय उम्मीदवारों को बाकियों के मुकाबले थोड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि समय-समय पर दीगर जातियों के साथ क्षत्रियों की लामबंदी से उन्हें वोटों का फायदा भी मिलता रहा है।

भाजपा और कांग्रेस ने इस बार बदल ली रणनीति

यहां जातीय गणित सबसे प्रभावी जरूर है, लेकिन केवल इसी आधार पर चुनाव जीता जा सकता है यह कहना सही नहीं होगा क्योंकि 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को क्षत्रिय वर्ग के उम्मीदवार ने यहां से जीत दिलाई थी। इस बार कांग्रेस ने क्षत्रिय उम्मीदवार कविता सिंह को मैदान में उतारा है, तो दूसरी ओर भाजपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी वी.डी. शर्मा पर दांव चला है। उम्मीदवारों के चयन में इस बार दोनों दलों ने रणनीति बदल ली है। कांग्रेस जहां दो बार से ब्राह्मण और भाजपा क्षत्रिय उम्मीदवार पर दांव लगा रही थी, वहीं इस बार मामला पलट गया है।

कैसा होगा 2019 का महामुकाबला

इस सीट से कांग्रेस को आखिरी बार 1999 में जीत मिली थी, लेकिन पार्टी का कहना है कि इस बार कविता सिंह ही यहां कांग्रेस का सूखा खत्म करेंगी। वहीं दूसरी तरफ भाजपा के उम्मीदवार और संघ के करीबी माने जाने वाले वीडी शर्मा टिकट की घोषणा के बाद से ही अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और कांग्रेस की अदली-बदली जातिगत रणनीति के बीच यहां फिर से कमल खिलेगा या अबकी बार कांग्रेस वापसी करेगी।

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