केंद्र सरकार ने कैंसर की पहचान और निदान में इस्तेमाल होने वाले एआई आधारित सॉफ्टवेयर को मरीजों की सुरक्षा के लिए उच्च जोखिम (क्लास-सी) श्रेणी में रखा है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के अनुसार, ऐसे एआई टूल्स अब सामान्य डिजिटल साधन नहीं बल्कि चिकित्सा उपकरण माने जाएंगे। इनके उपयोग से पहले लाइसेंस, नियामकीय मंजूरी, क्लिनिकल वैलिडेशन और परफॉर्मेंस डेटा अनिवार्य होगा।
कैंसर इलाज में तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई इस्तेमाल के बीच केंद्र सरकार ने मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सख्त फैसला लिया है। एआई आधारित कैंसर पहचान और निदान करने वाले सॉफ्टवेयर को सरकार ने हाई रिस्क श्रेणी में रखने की घोषणा की है। साथ ही स्पष्ट किया है कि ऐसे किसी भी सॉफ्टवेयर का उपयोग नियामकीय मंजूरी और लाइसेंस के बिना नहीं किया जा सकेगा।
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हाई रिस्क श्रेणी का मतलब है कि कोई चिकित्सा उपकरण या एआई सॉफ्टवेयर जो मरीज की जान, इलाज के फैसलों या बीमारी की दिशा पर सीधा असर डाल सकता है। इसलिए उस पर सबसे सख्त निगरानी और नियम लागू होंगे। सोमवार को नई दिल्ली स्थित केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने कैंसर की निगरानी व इलाज से जुड़े उपकरणों की नई सूची जारी की है, जिसके तहत कैंसर से जुड़े एआई आधारित सॉफ्टवेयर को क्लास-सी (उच्च जोखिम) श्रेणी में शामिल किया है। अब ये सॉफ्टवेयर सामान्य डिजिटल टूल नहीं, बल्कि चिकित्सा उपकरण की तरह माने जाएंगे और उन पर वही सख्त नियम लागू होंगे जो अन्य उच्च जोखिम वाले चिकित्सा उपकरणों पर होते हैं।
इस्तेमाल के बाद भी करनी होगी निगरानी
नए नियमों के तहत अब ऐसे एआई सॉफ्टवेयर को बाजार में लाने या अस्पतालों में इस्तेमाल करने से पहले सीडीएससीओ से लाइसेंस लेना, क्लिनिकल वैलिडेशन और परफॉर्मेंस डेटा प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, इस्तेमाल के बाद भी इनकी निरंतर निगरानी करनी होगी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जो एआई सॉफ्टवेयर एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई, पैथोलॉजी स्लाइड या अन्य कैंसर की पहचान करते हैं उन्हें अब क्लिनिकल डेटा, परफॉर्मेंस वैलिडेशन और नियामकीय अनुमति से गुजरना होगा।
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सुरक्षित नवाचार के लिए लिया फैसला
चिकित्सा तकनीक क्षेत्र से जुड़े कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्टार्ट-अप्स पर नियामकीय दबाव बढ़ेगा लेकिन सरकार ने जारी सूची में साफ तौर पर कहा है कि यह फैसला नवाचार रोकने के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षित नवाचार सुनिश्चित करने के लिए है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि एआई केवल डॉक्टर की सहायता करेगा, अंतिम चिकित्सकीय निर्णय डॉक्टर का ही रहेगा। सीडीएससीओ ने कहा है कि नई रिस्क क्लासिफिकेशन के जरिए सरकार ने यह संदेश दिया है कि डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में तकनीक के साथ-साथ सुरक्षा और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
मरीजों के लिए क्या बदलेगा?
इससे कैंसर के इलाज में गलत निदान और गलत इलाज का खतरा कम होगा।
अस्पतालों में वही मशीनें और सॉफ्टवेयर इस्तेमाल हो सकेंगे, जिन्हें सीडीएससीओ से लाइसेंस और मंजूरी मिली होगी।
अगर किसी उपकरण से मरीज को नुकसान पहुंचता है तो उसकी रिपोर्ट अनिवार्य होगी और जरूरत पड़ने पर उस मशीन या सॉफ्टवेयर को बाजार से हटाया जा सकेगा।
एआई आधारित टूल्स सिर्फ डॉक्टर की मदद करेंगे। इलाज से जुड़ा अंतिम फैसला हमेशा डॉक्टर ही लेंगे।
सरकार का कहना है कि सख्त नियमों का मकसद इलाज महंगा करना नहीं, बल्कि मरीजों को सुरक्षित और भरोसेमंद तकनीक उपलब्ध कराना है।