वहीं इस लड़ाई की याचिका दायर करने वालों में सबसे पुराना नाम नाज फाउंडेशन का भी है, जिसने 2001 में भी धारा-377 को आपराधिक श्रेणी से हटाए जाने की मांग की थी। नाज फाउंडेशन की अध्यक्ष अंजलि गोपालन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से पहले एलजीबीटी समुदाय से माफी मांगी थी। जो दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट हमारे अधिकारों के लिए कितनी संजीदा है। अंजलि के मुताबिक अदालत ने सिविल राइट्स के लिए भी दरवाजा खोल दिया है और अब यह समुदाय पर निर्भर करता है कि वह आगे की लड़ाई कैसे लड़ेगा।
उन्होंने कहा कि एक समलैंगिक कपल शादी के बाद बच्चों को गोद लेने के बारे में भी सोचेगा, लेकिन हमारे कानून इसकी इजाजत नहीं देते। अंजलि का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि देश में सभी को समानता का अधिकार मिला हुआ है। इसलिए सभी को बराबर के अधिकार मिलने चाहिए।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में गोपनीयता और व्यक्तिगत आजादी के सिद्धांत को मान्यता दी है। हर किसी की निजता का सम्मान करना वक्त की जरूरत है।
साल्वे ने कहा कि समान नागरिक अधिकार और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई आगे जारी रहेगी। वहीं इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली प्रीथा श्रीकुमार ने समानता के अधिकारों की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि एक सामान्य कपल की तरह होमो सेक्शुअल कपल्स को भी सभी अधिकार मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि बाहरी देशों में समलैंगिक कपल्स बच्चे गोद ले सकते हैं।
विदेशों में ले सकते हैं गोद
गौरतलब है कि इंग्लेंड और वेल्स में सन् 2005, स्कॉटलैंड में सन् 2009 और नॉर्दन आयरलैंड में सन् 2013 से समलैंगिक जोड़ों का संयुक्त रूप से बच्चा गोद लेना कानूनी रूप से वैध है। लेकिन यहां के कानून के मुताबिक यह संभव नहीं है।
दक्षिण अफ्रिका के कानून की बात करें, तो वहां भी समलैंगिकता, समलैंगिक जोड़ों का विवाह और बच्चे गोद लेना कानूनी तौर पर वैध है। विधि आयोग ने कॉमन सिविल कोड पर पेश अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में सभी समुदायों के लिए गोद लेने के कानूनों में बदलाव की बात कही थी। आयोग ने कहा था कि जूवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 को मजबूत धर्मनिरपेक्ष कानून बनाने के लिए विस्तारित किया जाना चाहिए, ताकि सभी समुदायों के लोग बच्चों को गोद ले सकें।
वहीं केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में एकांत में परस्पर सहमति से वयस्कों के बीच सेक्स से संबंधित धारा 377 की संवैधानिक वैधता की परख करने का मामला शीर्ष अदालत के विवेक पर छोड़ दिया था। सरकार ने कहा था कि समलैंगिक विवाह, गोद लेना और दूसरे नागरिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट को विचार नहीं करना चाहिए।