सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि हजारों फूल खिलने दें और किसी भी स्रोत से ज्ञान को आने दें। इस टिप्पणी के साथ ही कि अदालत ने एक राजनीतिक दल को कोविड-19 की तैयारियों पर स्वत: संज्ञान लिए गए एक मामले में हस्तक्षेप करने और अपने सुझाव देने की अनुमति दी।
हालांकि न्यायालय ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। याचिका में पूरे देश में मुफ्त कोविड टीकाकरण नीति का निर्देश देने और वायरस के प्रभाव का पता लगाने और इसके प्रसार पर काबू के लिए सुझाव देने के लिए विशेषज्ञों का एक पैनल गठित करने की मांग की गई थी।
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि हालांकि जनहित याचिका कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान दायर की गई थी। आपका मकसद हमारे आदेशों के जरिए पूरा हो गया है। हम पहले ही कोविड तैयारियों पर स्वत: संज्ञान लिए गए मामले में आदेश पारित कर चुके हैं। आप उस मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं और अपने सुझाव दे सकते हैं। हजारों फूल खिलने दें, किसी भी संभव स्रोत से ज्ञान आने दें।
इस दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि विश्व राजनैतिक इतिहास में इस उद्धरण का एक अलग संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था, लेकिन यहां इसका अलग संदर्भों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
बता दें कि चीनी नेता माओत्से तुंग ने 1957 में देश की राजनीतिक व्यवस्था के संबंध में बुद्धिजीवियों के विभिन्न विचारों को आमंत्रित करने के लिए पहली बार इस उद्धरण का इस्तेमाल किया था।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने एसडीपीआई की ओर से पेश अधिवक्ता ए सेल्विन राजा से कहा कि आप उस मामले में अपने सुझाव दे सकते हैं। हम आपके हस्तक्षेप की अनुमति देंगे। आपका स्वागत है।
पीठ ने कहा कि अधिकतम लोगों को दायरे में लाने के लिए देश की टीकाकरण नीति में संशोधन किया गया है। अदालत के आदेश पर देश भर के प्रमुख डॉक्टरों, विषाणु विज्ञानियों और महामारी विज्ञानियों का एक राष्ट्रीय कार्यबल भी गठित किया गया है।