मध्य प्रदेश और राजस्थान में दिग्गज नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की बगावत बताती है कि कांग्रेस नेतृत्व के गंभीर संकट से जूझ रही है। सियासी जानकारों का कहना है कि इससे निकलने का ठोस खाका न होने से मौजूदा संकट गहराता जा रहा है। यही कारण है कि डेढ़ दशक से ज्यादा इंतजार के बाद मिली मध्य प्रदेश की सत्ता एक साल भी न चल पाई और राजस्थान सरकार भी मझधार में फंस गई।
राजनीतिक मामलों के जानकार योगेंद्र यादव इसे नेतृत्व का गंभीर संकट बताते हैं। बकौल योगेंद्र कांग्रेस में इस हालात से निकलने का कोई मजबूत रोडमैप नहीं और न भरोसेमंद नेतृत्व है। स्वराज इंडिया के संस्थापक यादव कहते हैं कि कांग्रेेस के पास न तो कोई विचारधारा है जिससे लोग जुडे़ं और न सत्ता का ‘मोह’ जो नेताओं को बांधे रख सके। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर कमल मित्र चिनॉय कहते हैं कि पार्टी गुटबाजी से जूझ रही है। हालांकि उनका मानना है कि पायलट का मामला सिंधिया से अलग है। पायलट ने अपनी ही सरकार को संकट में डालकर गलत किया। उन्हें पहले शीर्ष नेतृत्व से शिकायत करनी थी।
कांग्रेस की समस्या आंतरिक
राजनीतिक टिप्पणीकार और जेएनयू के प्रो संजय पांडेय कहते हैं कि सिंधिया और पायलट प्रकरण दिखाता है कि कांग्रेस आंतरिक समस्या से जूझ रही है। पार्टी एक परिवार के हाथ में शक्ति के अति-केंद्रीकरण और उन्हें सलाह देने वाले शीर्ष स्तर पर पुराने सिपहसालारों की समस्या से जूझ रही है। राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने और सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद संकट गहरा होता जा रहा है। निर्णय लेने में देरी पार्टी को और कमजोर कर रही है। ऐसे पुराने मठाधीश जो जनता की नब्ज तक नहीं पकड़ पा रहे उनके चलते युवाओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल रहा।
युवा कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटेगा
पायलट के पार्टी से अलग होने का असर युवा कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ेगा। एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा, प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर कांग्रेस को खड़ा करने में पायलट ने बहुत मेहनत की। यही कारण कारण है कि विधानसभा चुनाव में जीत मिली। पार्टी से उनका अलग होना कार्यकर्ताओं का मोबल तोड़ देगा।