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महिलाओं के वोटों से पावर में आने वाले नेता आखिर उन्हें सत्ता देने से क्यों डरते हैं...

Sat, 27 Apr 2019 12:37 AM IST
गौरव द्विवेदी डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
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महिला मतदाता - फोटो : Amar Ujala
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देश के विभिन्न महिला संगठनों ने राजनीति और सत्ता में अपनी हिस्सेदारी को लेकर आवाज उठाई है।इसके लिए शुक्रवार को ट्विट चैट कैम्पेन शुरू किया गया। महिलाओं ने @Time33Percent पर अपनी बात कही। इस चैट कैम्पेन का फोकस ‘महिलाओं के वोटों से पावर में आने वाले नेता आखिर उन्हें सत्ता देने से क्यों डरते हैं’ रहा। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) की निदेशक रंजना कुमारी ने कहा, लोकसभा चुनाव से पहले अनेक पार्टियों ने महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया था, लेकिन अब टिकट वितरण में उनकी पोल खुल गई है। राजनीतिक दल महिलाओं के वोट तो लेना चाहते हैं, मगर उन्हें सत्ता में पर्याप्त हिस्सेदारी देने की बात पर वे क़दम पीछे खींच लेते हैं।

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ट्विट चैट कैम्पेन में महिलाओं ने अपने साथ हो रहे भेदभाव को लेकर जमकर आवाज उठाई। महिलाओं का कहना था कि बीजू जनता दल और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस को छोड़ दें तो बाकी पार्टियों ने महिलाओं को लोकसभा का टिकट देने में पूरा भेदभाव किया है। उक्त दोनों राजनीतिक दलों ने बीस फ़ीसदी टिकट महिलाओं को दिए हैं। रंजना कुमारी का कहना है, चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले महिला संगठनों ने सभी पार्टियों के नेताओं से मिलकर यह मांग की थी कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए।उस दौरान राजनीतिक दलों ने कहा, वे इस मांग को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करेंगे। कई पार्टियों ने इसे शामिल भी किया, लेकिन जब टिकट देने की बारी आई तो पार्टियाँ अपना वादा भूल गई। टिकट वितरण में उनका वादा झूठा निकला।

महिलाओं को सत्ता तक पहुंचने का माध्यम समझना बड़ी भूल होगी...

रंजना कुमारी का कहना है, जो पार्टियाँ महिलाओं को सत्ता तक पहुंचने का केवल एक माध्यम मान रही हैं, यह उनकी बड़ी भूल है। अब देश की सभी महिलायें अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीख गई हैं। ट्विट चैट कैम्पेन में महिलाओं ने आपस में कई सवाल भी किए हैं, जैसे अब वे चुप नहीं बैठेंगी, नहीं सहेंगी। महिलाओं को सत्ता से दूर रखने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। 33 फीसदी आरक्षण का बिल कब तक एक्ट में तब्दील हो सकेगा। क्या इसके लिए 1 साल, एक दशक, 100 साल या सौ साल से ज्यादा वक्त लगेगा। चुनाव में जीतने की क्षमता, जैसी शर्तें महिलाओं पर ही क्यों थोपी जाती हैं। 
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महिलाओं की स्थिति पर एक नजर...

जॉर्ज टाउन इंस्टिट्यूट ग्लोबल रैंकिंग ऑफ वूमेन इंक्लूजन एंड वेल बींग, की रिपोर्ट में भारत का नंबर 131 वां है। इस सर्वे रिपोर्ट में कुल 152 देश शामिल किए गए हैं। टॉप 5 देशों में आयरलैंड, नार्वे, स्विटजरलैंड, सलोवेनिया और स्पेन हैं। भारत के पड़ोसी देशों की स्थिति को देखें तो पाकिस्तान 150, अफगानिस्तान 152, बांग्लादेश 127, म्यांमार 119, भूटान 108, नेपाल 85, चीन 87 और श्रीलंका 97 वें स्थान पर है। साल 2012 के दौरान भारत में एक लाख महिलाओं के पीछे अपराध होने की दर 41.7 फीसदी थी, जबकि 2016 में यह दर बढ़ कर 55.2 फीसदी हो गई है। अगर दस साल पहले यानी 2007 की बात करें तो भारत में हर घंटे 21 महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएं होती थी, 2016 में यह आँकड़ा बढ़कर 39 हो गया है।

भारत में अभी तक राष्ट्रीय विधायिका में केवल 12 फीसदी महिलाएं...

महिलाओं का विधायिका में प्रतिनिधित्व, यदि इस मुद्दे पर बात की जाए तो भारत में केवल 12 फीसदी महिलाएं ही राष्ट्रीय विधायिका में स्थान पा सकी हैं। खास बात है कि जनसंख्या में महिलाओं का प्रतिशत 48 है। आयरलैंड, नार्वे, स्विटजरलैंड, सलोवेनिया और स्पेन की विधायिका तीस फीसदी सीटों पर महिलाएं हैं। न्यूजीलैंड में 38 फीसदी महिलाओं का संसदीय सीटों पर कब्जा है। अमेरिका में सीनेट के दोनों सदनों को देखें तो महिलाओं का प्रतिशत 22 है। भारत में फ़िलहाल निम्न सदन यानी लोकसभा की 542 सीटों में से 64 पर महिलाएं हैं, जबकि उपरी सदन यानी राज्यसभा में 237 सीटों में से 27 पर महिलाएं हैं।

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