भारत में इस वक्त स्वदेशी हथियारों और उपकरणों के इस्तेमाल को जोर-शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। डीआरडीओ से लेकर एचएएल तक भारतीय सेना के तीनों अंगों को मजबूत करने के लिए लगातार नई तकनीक विकसित करने में जुटे हैं। इसी कड़ी में सोमवार को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने जोधपुर में भारतीय वायुसेना को स्वदेशी निर्मित लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर (LCH) सौंपे। यह पहली बार है जब पूरी तरह भारत में ही निर्मित हेलीकॉप्टर्स को देश की सेना को दिया गया है। इन्हें 'प्रचंड' नाम दिया गया है। खुद देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस हेलीकॉप्टर में सफर किया।
एलसीएच प्रचंड की खासियतें क्या हैं? इसे बनाने का विचार कब और किन वजहों से आया? आखिर भारत का पहला स्वदेशी हेलीकॉप्टर है कितना खतरनाक? सैन्यबलों में यह कैसे सेवाओं में इस्तेमाल होगा? आइये जानते हैं...
एलसीएच प्रचंड।
- फोटो : PTI
क्या है एलसीएच प्रचंड की खासियतें?
प्रचंड एक लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर है। यानी इसका वजन आम हेलीकॉप्टर्स के मुकाबले कम होता है, जो इसे ज्यादा ऊंचाई और उच्च दाब वाले क्षेत्रों में ज्यादा कारगर बनाता है। एचएएल के मुताबिक, प्रचंड हेलीकॉप्टर का वजन 5800 किलो के करीब है। इसकी रफ्तार 268 किलोमीटर प्रतिघंटा तक है। इसके अलावा यह हेलीकॉप्टर एक बार में 550 किमी तक की दूरी बिना रिफीलिंग के पूरा कर सकता है। साथ ही इसके उड़ने की क्षमता तीन घंटे से भी ज्यादा की है।
प्रचंड को जो चीज सबसे खास बनाती है, वह है इसके उच्च दाब वाले क्षेत्र में उड़ने की क्षमता। दरअसल, ज्यादा ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में कोई भी विमान काफी देर तक उड़ान नहीं भर सकता। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल (ग्रैविटी), तापमान और घनत्व के चलते भारी एयरक्राफ्ट्स लंबे समय तक ऊंचाई में नहीं रह सकते। लेकिन अपने हल्के वजन की वजह से प्रचंड बड़ी ऊंचाईयों में भी उड़ान भरने में सक्षम है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रचंड सबसे ऊंचाई वाले उच्च दाब के क्षेत्र में भी लंबे समय तक रह सकता है।
बताया गया है कि एलसीएच को बनाने में जो उपकरण और सामग्रियों का इस्तेमाल हुआ है, उनमें से 45 फीसदी स्वदेशी हैं। आईएएफ का दावा है कि यह दुनिया का इकलौता अटैक हेलीकॉप्टर है, जो कि 5,000 मीटर (16 हजार 400 फीट) तक की ऊंचाई पर आसानी से लैंड और टेक-ऑफ कर सकता है। वह भी हथियारों के अच्छे-खासे वजन के साथ।
भारत को क्यों बनाना पड़ा लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर?
भारत को लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर बनाने का विचार पहली बार 1999 के करगिल युद्ध के बाद आया। दरअसल, इस युद्ध में पाकिस्तानी सैनिकों ने करगिल की ऊंचाई वाली चोटियों पर कब्जा कर लिया था। भारतीय वायुसेना उस वक्त मुख्यतः रूस द्वारा निर्मित हेलीकॉप्टरों का ही इस्तेमाल कर रही थी, जो कि इतनी ऊंचाई पर ज्यादा कारगर नहीं थे। आखिरकार भारत को रूस के ही एमआई-17 हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करना पड़ा था। इसी के बाद से भारतीय वायुसेना ने एलसीएच प्रोजेक्ट पर गंभीरता से विचार शुरू किया।
एलसीएच प्रचंड।
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आखिरकार 2006 में भारत में लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर के प्रोजेक्ट को लॉन्च किया गया। एचएएल ने तब एलान किया कि वह ऐसा हेलीकॉप्टर विकसित करेगा जो कि कठिन से कठिन रेगिस्तानी क्षेत्र के साथ-साथ लद्दाख और सियाचिन ग्लेशियर जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी आसानी से अभियान में काम आ सके। चार साल तक इस प्रोजेक्ट पर काम करने के बाद आखिरकार 29 मार्च 2010 को भारत में एलसीएच की पहली टेस्ट फ्लाइट सफलतापूर्वक पूरी हुई। हालांकि, प्रोटोटाइप वर्जन को और आधुनिक बनाने का काम शुरू किया गया।
एलसीएच प्रचंड।
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जनवरी 2019 और फरवरी 2020 में इस लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर में हथियारों का ट्रायल किया गया। एचएएल ने तब एलान किया था कि उसका यह हेलीकॉप्टर अभियानों के लिए वायुसेना में शामिल किए जाने के लिए तैयार है। हालांकि, इसके बाद कोरोनावायरस महामारी के चलते एलसीए को लेकर बात आगे नहीं बढ़ पाई। इस साल मार्च में सुरक्षा मामलों से जुड़ी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) ने 3887 करोड़ रुपये के खर्च से 15 हेलीकॉप्टरों के अधिग्रहण को मंजूरी दी। इनमें से 10 हेलीकॉप्टर वायुसेना के लिए, जबकि पांच को थलसेना के लिए खरीदने का प्रस्ताव है।
भारत का पहला स्वदेशी हेलीकॉप्टर है कितना खतरनाक?
1. एलसीएच प्रचंड एक अटैक हेलीकॉप्टर है। हालांकि, अलग-अलग जरूरतों के तहत इसे कई और अभियानों में भी लगाया जा सकता है। खासकर धीमी चाल वाले हवाई टारगेट की ट्रैकिंग के लिए, घुसपैठ को रोकने के लिए। इसके अलावा इन हेलीकॉप्टर्स का इस्तेमाल दुश्मन देशों की रक्षा प्रणालियों को फेल करने, सर्च ऑपरेशन, राहत और बचाव कार्य के अलावा युद्ध में टैंकों और अन्य हथियारों को तबाह करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
2. एलसीएच प्रचंड एक ट्विन-इंजन हेलीकॉप्टर है। हेलीकॉप्टर में एचएएल द्वारा मॉडिफाइड शक्ति टर्बोशाफ्ट इंजन्स का इस्तेमाल किया गया है, जो मूलतः फ्रांस की तकनीक पर आधारित हैं और एक बार में 871 किलोवॉट तक की पावर जेनरेट कर सकते हैं। यह इंजन बिना मेंटेनेंस के 3,000 घंटों तक काम कर सकते हैं। इन इंजन्स को यूरोप की उड्डयन सुरक्षा एजेंसी की तरफ से 2007 में ही क्लियरेंस मिल गया था। प्रचंड में डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम है, जिससे पायलट को इस हेलिकॉप्टर को उड़ाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी एलसीएच प्रचंड में उड़ान भरी।
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3. इस अटैक हेलीकॉप्टर में शीशे का कॉकपिट है। इसमें एक साथ दो क्रू सदस्य सवार हो सकते हैं, जिनके पास हेलीकॉप्टर का कंट्रोल होता है। इसके डिजिटल कंट्रोल पैनल में लक्ष्य को निशाना बनाने के साथ हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े फीचर्स दिए गए हैं। इसके अलावा प्रचंड में एक डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर पहले से ही लगा है, जो युद्धक्षेत्र की पूरी जानकारी पहुंचाता है।
4. इस एलसीएच की सबसे खास बात है इसमें लगे सेंसर्स। इनमें एक साधारण कैमरा और इन्फ्रा रेड कैमरा लगा है। ये कैमरे खराब मौसम में भी दुश्मनों की लोकेशन और स्थिति का सटीक पता लगाने में सक्षम हैं। इसके अलावा जमीन और हवाई लक्ष्यों पर गोलीबारी, लेजर-गाइडेड बम और मिसाइलों से निशाना साधने के लिए लेजर डेजिग्नेटर का भी इस्तेमाल किया गया है, जो इसके निशानों को अचूक बना देता है।
किन हथियारों से लैस है प्रचंड?
हथियारों की बात की जाए तो आईएएफ ने इसके लिए भी जबरदस्त तैयारी की है। प्रचंड में हवाई लक्ष्यों को मार गिराने के लिए एयर-टू-एयर मिसाइलें लगाई गई हैं। इसके अलावा जमीनी टारगेट्स को ध्वस्त करने के लिए एयर-टू-सर्फेस मिसाइलें भी हैं। हेलीकॉप्टर में 20 एमएम कैलिबर वाली बंदूक और 70 एमएम वाले रॉकेट्स भी लगाए गए हैं। इसी साल अप्रैल में एलसीएच से हेलिना की सफलतापूर्वक फायरिं की गई थी। यह एक एंटी-टैंक मिसाइल है, जिससे पोकरण रेंज में पांच किलोमीटर की दूरी पर हथियारबंद गाड़ी पर निशाना लगाया गया था। इस मिसाइल का निर्माण डीआरडीओ की तरफ से किया गया है।
एलसीएच प्रचंड।
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सैन्यबलों के लिए सबसे सुरक्षित
इस हेलीकॉप्टर के क्रू को सुरक्षित रखने के लिए भी कई इंतजाम किए गए हैं। हेलिकॉप्टर में रडार से आने वाले सिग्नलों को सोखने की क्षमता वाले पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे दुश्मनों के लिए इसे ट्रैक करना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसके अलावा खतरनाक से खतरनाक क्रैश की स्थिति में भी क्रू को नुकसान से बचाने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा केबिन को इस तरह बनाया गया है कि यह किसी भी तरह के बायोलॉजिकल, केमिकल और न्यूक्लियर हमले की स्थिति में क्रू का बचाव कर सके।