विधि आयोग ने प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में संशोधनों की सिफारिश की है। आयोग ने भीड़ हिंसा को हत्या के साथ न जोड़कर उसे अलग अपराध बनाने का सुझाव दिया है। आयोग ने शुक्रवार को एक संसदीय समिति से कहा कि यह परिभाषित करने की आवश्यकता है कि प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता में लिंचिंग यानी भीड़ हिंसा की मात्रा क्या है।
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) का स्थान लेने वाले प्रस्तावित बीएनएस में पहली बार भीड़ हिंसा को अपराध बनाया गया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक, उसके हत्या के साथ जोड़ दिया गया है। विधि आयोग ने सुझाव दिया कि भीड़ हिंसा को अलग किया जाना चाहिए और हत्या के हिस्से के बजाय इसे एक अलग अपराध के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक बृजलाल की अध्यक्षता वाली गृह मामलों पर संसद की स्थायी समिति के साथ बैठक में विधि आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस (सेवानिवृत्त) अवस्थी ऋतुराज अवस्थी भी मौजूद थे।
भीड़ हिंसा को परिभाषित करने का सुझाव
सूत्रों ने बताया कि आयोग का कहना था कि अधिक स्पष्टता के लिए यह आवश्यक है कि भीड़ हिंसा की मात्रा को परिभाषित किया जाए। आईपीसी में मौजूद विक्षिप्त दिमाग, पागल और बेवकूफ को औपनिवेशिक काल का मानते हुए उनके स्थान पर बीएनएस में मानसिक बीमारी शब्द रखा गया है। मानसिक बीमारी की परिभाषा को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 से लिया गया है।
मानसिक बीमारी की जगह विक्षिप्त दिमाग हो
विधि आयोग की प्रस्तुतियों का हवाला देते हुए सूत्रों ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल कानून का उद्देश्य और लक्ष्य अलग है। अधिनियम में अपवादों के साथ मानसिक बीमारी का उल्लेख किया गया है। आयोग ने संसदीय समिति को बताया इसकी परिभाषा से कई सारे भ्रम पैदा होंगे। आयोग ने सुझाव दिया कि आपराधिक न्यायशास्त्र के प्रयोजन के लिए इस शब्द को बीएनएस में जहां भी आवश्यक हो, परिभाषित किया जाना चाहिए। दुरुपयोग की संभावना देखते हुए आयोग ने मानसिक बीमारी की जगह विक्षिप्त दिमाग शब्द का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया है।