केंद्र सरकार को कई बार सोशल मीडिया की वजह से जोखिम का सामना करना पड़ा है। पिछले साल सोशल मीडिया की एक चूक ने पूरे देश को दिक्कत में डाल दिया था। उस वक्त देश में कोरोना को लेकर भय का माहौल बन चुका था। इस वैश्विक महामारी को लेकर सोशल मीडिया में तरह तरह की बातें कही जा रही थीं। सरकार ने जो स्टैंड लिया था, उसे विपरित बातें जनता में फैलाई जा रही थी।
इससे कोरोना को हराने की लड़ाई, जो उस वक्त तक ठीक से शुरू नहीं हो सकी थी, उस पर सोशल मीडिया के कंटेंट का गलत असर पड़ा। पीएमओ और केंद्रीय गृह मंत्रालय को हस्तक्षेप करना पड़ा।
इसके बाद इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 20 मार्च 2020 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वाली कंपनियों को सख्त लहजे में एक पत्र लिखा था।
गत वर्ष जब कोरोना की शुरुआत हुई थी तो देश में कई तरह की भ्रामक बातें फैलाई जाने लगीं। कुछ लोगों का कहना था कि सरकार ने समय रहते सक्रियता नहीं दिखाई। जनवरी या फरवरी में कोई सख्त कदम उठाना चाहिए था। कोरोना महामारी के इलाज को लेकर चिकित्सा जगत में भी कुछ अलग राय दिखी। इन सबके बीच स्वदेशी दवा और इलाज को लेकर कई बातें सामने आईं। मार्च के शुरू में सोशल मीडिया में कोरोना से जुड़ी ऐसी सामग्री वायरल हुई, जिसके चलते सरकार को सख्त होना पड़ा।
एमआईटीवाई ने फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टिकटॉक और हेलो जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को एक एडवायजरी जारी की। इसमें कहा गया था कि उपयोगकर्ताओं को कोरोना वायरस से संबंधित किसी झूठी खबर या गलत सूचना, जो लोगों में दहशत पैदा न करने और सार्वजनिक व्यवस्था एवं सामाजिक शांति को बिगाड़ने की संभावना रखते हैं, को अपलोड, प्रसारित नहीं करने के लिए उपयोगकर्ताओं की खातिर अपने प्लेटफॉर्म पर जागरुकता अभियान शुरू करें।
प्राथमिकता के आधार पर अपने प्लेटफॉर्म पर होस्ट की गई ऐसी सामग्री का अक्षम करने या हटाने के लिए तत्काल कार्रवाई की जाए। जहां तक संभव हो, कोरोना वायरस से संबंधित प्रामाणिक जानकारी के प्रसार को बढ़ावा दिया जाए। बता दें कि एमआईटीवाई नियमित रूप से इंटरनेट पर फर्जी खबरें, गलत सूचनाओं और जानकारी के फैलने से संबंधित मुद्दों पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के साथ बातचीत करती है। साथ ही आईटी एक्ट 69क के तहत कार्रवाई भी करती है।