हालांकि ये कहा जाता है कि 5:17 बजे उन पर गोली चली। आम तौर पर वे 5:10 बजे प्रार्थना के लिए आ जाते थे, लेकिन उस दिन कुछ देर हो गई थी। उनकी आयु और उनके स्वास्थ्य की वजह से हमेशा उनके कंधे और हाथ मनु और आभा के कंधे पर रहते थे। उस दिन भी उन्हीं के कंधों पर उनका हाथ था। तभी पहली गोली की आवाज आई।
मुझे ऐसा लगा कि दस दिन पहले जो पटाखा चला था वैसा ही हुआ है। मैं उसी एहसास में था कि दूसरी गोली चली। मैं इक्विपमेंट छोड़कर भागा, उस तरफ गया जहां काफी भीड़ थी। तभी तीसरी गोली चली। मैंने अपनी आंखों से देखा।
बाद में पता चला कि गोली मारने वाले का नाम नाथू राम गोडसे था। उसने खाकी कपड़े पहने थे। उसका कद काफी मेरे जैसा ही था। डीलडौल भी मेरे जैसी ही थी। तीसरी गोली चलाने के बाद उसने दोबारा से हाथ जोड़े।
मैंने सुना है पहली गोली चलाते हुए भी हाथ जोड़े थे। उसके बाद लोगों ने उसे पकड़ लिया। उसने किसी भी तरह का विरोध नहीं किया बल्कि अपनी जो रिवॉल्वर थी, उसे भी उनके हवाले कर दिया।
इससे पहले 20 जनवरी, 1948 को भी बिड़ला हाउस में हमला हुआ था। अगले दिन अखबारों में छपा कि मदन लाल पाहवा नाम के शख्स ने पटाखा चलाया था और उसकी ये भी मंशा थी कि गांधीजी को किसी तरीके से चोट पहुंचाई जाए।
उसी दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने ये कहा कि जिस किसी ने भी ये कोशिश की थी उसे मेरी तरफ से माफ कर दिया जाए। गांधीजी का ये आदेश था कि कोई भी पुलिस वाला उनकी प्रार्थना सभा में नहीं होगा, लेकिन जब 30 जनवरी को उन पर हमला हुआ तो कुछ लोगों ने पुलिस को इत्तिला दी।
अंत्येष्टि
गोडसे को पार्लियामेंट स्ट्रीट के डीएसपी जसवंत सिंह और तुगलक रोड थाने के इंस्पेक्टर दसौदा सिंह ने पकड़ा हुआ था। बिड़ला हाउस में भगदड़ मची हुई थी। गांधीजी को बिड़ला हाउस के अंदर लेकर जाया जा रहा था।
गोडसे को तुगलक रोड थाने में ले जाया गया था। वहां पर गांधी जी की हत्या का एफआईआर लिखा गया। पुलिस ने गांधी की हत्या का एफआईआर कनाट प्लेस के एम-56 में रहने वाले नंदलाल मेहता से पूछ कर लिखा।
मुझे वह दिन भी याद हैं जब गांधीजी की अंत्येष्टि हुई थी। 31 जनवरी को मैं भी शाम के वक्त राजघाट पहुंच गया था। उस काले दिन राजधानी की सड़कों पर मुंड ही मुंड दिख रहे थे।
सैकड़ों लोगों ने गांधी की मौत के गम में अपने सिर मुंडवा लिए थे। राजधानी और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के हजारों लोग अपना देसी घी लेकर श्मशान स्थल पर पहुंच गए थे। इनकी चाहत थी कि जो घी वे लेकर आए हैं, उसीसे गांधी की अंत्येष्टि हो जाए।
शव यात्रा बिड़ला हाउस से जनपथ, कनाट प्लेस, आईटीओ होते हुए राजघाट पहुंची थी। शववाहन पर पंडित नेहरू और सरदार पटेल बैठे थे। दोनों शोकाकुल थे। उसी वाहन पर गांधी के पुत्र रामदास और देवदास भी थे। इन्होंने ही अपने पिता को मुखाग्नि दी थी। वैसे, गांधी जी की अंत्येष्टि की सारी व्यवस्था भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर सर राय बूचर कर रहे थे।
बहरहाल, मुझे गांधी जी रेडियो वाला बाबू कह कर बुलाते थे। रोज मिलते रहने के चलते बापू मुझे जानने लगे थे। कभी कभी गांधीजी आधे घंटे से ज्यादा बोल जाते थे। मेरे लिए बड़ा मुश्किल होता था उनकी स्पीच को एडिट करना।
मैंने ये बात उनकी सहयोगी डॉक्टर सुशीला नायर को बताई कि उन्हें एडिटिंग करने में काफी परेशानी होती है। सुशीला जी सुनते ही नाराज हो गईं। कहने लगी कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई गांधीजी की बातों को एडिट करने की। मैं इसकी शिकायत सरदार पटेल से करूंगी।
मैंने सोचा कि मेरी नौकरी तो जानी ही है तो मैंने बड़ी हिम्मत करके एक दिन प्रार्थना सभा से ठीक पहले अपनी परेशानी गांधीजी को बताई। उन्होंने बड़ी ही विनम्रता के साथ कहा, "जैसे ही 28 मिनट पूरे हों तो आप उंगली उठा देना। जैसे ही मेरी उंगली गांधी देखते थे, वे कहते- बस, कल बात करेंगे।"