उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को एक प्रस्तावित आवासीय सोसायटी को भूमि आवंटन को लेकर महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि यह बहुमूल्य भौतिक संसाधन है और इसलिए राज्य से कम से कम अपेक्षित बात यह है कि इसके वितरण में पारदर्शिता बरती जाए। मामले में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें भूमि के आवंटन में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया गया था।
'भूमि समुदाय का बहुमूल्य भौतिक संसाधन'
शीर्ष अदालत ने कहा कि मेडिनोवा रीगल कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (एमआरसीएचएस) को भूखंड आवंटित किए जाने का पूरा इतिहास 'भाई-भतीजावाद और पक्षपात' को दर्शाता है, जो पहले से ही आवंटन के योग्य भी नहीं है। पीठ ने कहा, 'भूमि समुदाय का बहुमूल्य भौतिक संसाधन है और इसलिए राज्य से कम से कम जो अपेक्षित है वह इसके वितरण में पारदर्शिता है। हमारी राय में, इसलिए एमआरसीएचएस के पक्ष में आवंटन में पूरी तरह से मनमानी हुई है।'
'प्रक्रिया के साथ-साथ पात्रता मानदंडों का भी उल्लंघन'
शीर्ष अदालत ने कहा, 'जहां तक मौजूदा अपीलकर्ता का सवाल है, भूखंड आवंटन का उसका मामला ऐसा मामला है जिस पर अधिकारियों की तरफ से अभी फैसला लिया जाना है, लेकिन एमआरसीएचएस के पक्ष में भूखंड का आवंटन उचित नहीं है, क्योंकि यह प्रक्रिया के साथ-साथ पात्रता मानदंडों का भी उल्लंघन है।' पीठ ने कहा कि अभिलेखों के अवलोकन से पता चलता है कि सोसायटी का एक भी सदस्य टाटा मेमोरियल अस्पताल में डॉक्टर नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा, 'डॉक्टर को छोड़ दें, एक भी सदस्य टाटा मेमोरियल अस्पताल का कर्मचारी नहीं है, जो पहले अनुमान था और जिसके लिए भूखंड आवंटित करने की मांग की गई थी।' इस सोसायटी की संरचना भी अब मूल से पूरी तरह बदल गई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि भूमि सरकार की विवेकाधीन शक्तियों के तहत आवंटित की गई थी, तो लिखित में कारण बताना आवश्यक था कि किसी विशेष सोसायटी के पक्ष में ऐसा आवंटन क्यों किया गया।
भूमि आवंटन के मामलों में होनी चाहिए पारदर्शिता- कोर्ट
पीठ ने कहा, 'चूंकि सरकार की तरफ से भूमि आवंटन के मामलों में पारदर्शिता होनी चाहिए, इसलिए आवंटन के मामलों में उपरोक्त नियमों और विनियमों का पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है, लेकिन दुर्भाग्य से, वर्तमान मामले में यह सब पूरी तरह से गायब है, जहां निर्धारित प्रक्रिया का पूर्ण उल्लंघन करते हुए एमआरसीएचएस के पक्ष में आवंटन किया गया था।'
क्या है एमआरसीएचएस का पूरा मामला?
एमआरसीएचएस, एक प्रस्तावित हाउसिंग सोसाइटी, ने 2000 में बांद्रा में एक भूखंड के आवंटन के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को आवेदन किया था। उनके आवेदन में उल्लेख किया गया था कि आवेदक सोसाइटी के सदस्य टाटा मेमोरियल सेंटर, एक प्रमुख अस्पताल और कैंसर अनुसंधान संस्थान में काम करते हैं, और सदस्यों के पास 20 साल या उससे अधिक समय तक महाराष्ट्र में रहने के बावजूद कोई घर नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि वे ऐसे स्थानों पर रह रहे थे, जो उनके कार्यस्थल से बहुत दूर थे और इसलिए यात्रा करना कठिन और समय लेने वाला था। आवंटन के लिए अनुरोध करते समय तर्क दिया गया कि डॉक्टर होने के नाते उन्हें आपात स्थिति में प्रतिक्रिया देने के लिए समय पर अस्पताल पहुंचना था।