केंद्र शासित प्रदेश 'लक्षद्वीप' में पिछले कुछ दिनों से विरोध के स्वर गूंज रहे हैं। वजह, प्रशासक प्रफुल्ल पटेल ने यहां के कायदे कानूनों में कई तरह के बदलावों का एक ड्राफ्ट तैयार कर दिया है। लोग उसका विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस मसले पर बोल चुके हैं। अब देश के 93 नामचीन पूर्व नौकरशाहों ने लक्षद्वीप मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है।
इनमें सी बालाचंद्रन, वजाहत हबीबुल्लाह, हर्ष मंदेर, शिव शंकर मेनन और जूलियो रिबेरो आदि शामिल हैं। पत्र में पीएम से अपील की गई है कि वे इस ड्राफ्ट को रद्द करें। लक्षद्वीप को एक पूर्णकालिक, लोगों के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी प्रशासक प्रदान किया जाए।
सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री, पूर्व नौकरशाहों की बात को कितनी तवज्जो देंगे, ये देखने वाली बात होगी। लक्षद्वीप की 96 फीसदी आबादी मुस्लिम है इसलिए भाजपा और आरएसएस अपना एजेंडा यहां चला रही है। पूर्व नौकरशाहों ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि विश्व पर्यावरण दिवस पर आपको भेजा गया पत्र हमारे दृढ़ विश्वास की पुष्टि है कि मानव जीवन दृढ़ता के साथ पृथ्वी से बंधा हुआ है।
पटेल ने लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन (एलडीएआर), लक्षद्वीप असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम विनियमन (आमतौर पर जिसे पासा या गुंडा अधिनियम के रूप में जाना जाता है) और लक्षद्वीप पशु संरक्षण विनियमन (एलएपीआर) का मसौदा केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास भेजा है।
इस द्वीप पर 96 फीसदी मुस्लिम रहते हैं। साल 2019 की एनसीआरबी रिपोर्ट में लिखा है, यहां आईपीसी के केवल 123 केस दर्ज हुए थे। एसएलएल के 59 मामले दर्ज हुए थे। अपराध दर 0.7 प्रतिशत है। पूर्व नौकरशाहों का कहना है कि इसके बावजूद लक्षद्वीप में ऐसे कानून का मसौदा तैयार कर दिया गया, जिसमें एक साल तक बिना कारण बताए किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है।
जाहिर है कि यहां पर 96 फीसदी मुस्लिम है तो बीफ पर प्रतिबंध लगाने का नियम बना दिया गया। दो बच्चों से ज्यादा वालों के लिए पंचायत चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी जाएगी। भूमि अधिग्रहण से जुड़े नियमों में जो बदलाव होंगे, उनसे द्वीप की विरासत बच पाएगी, कहना मुश्किल है। पूर्व नौकरशाहों ने लिखा है, लक्षद्वीप की विरासत मातृवंशीय, समानाधिकारवादी और जातीय तौर पर केरल से मिलती जुलती है। वैज्ञानिक और जलवायु विशेषज्ञों की रिपार्ट के मुताबिक, इस द्वीप पर मानव गतिविधियों में वृद्धि के चलते यहां पर कई नए खतरे पैदा होंगे।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते समुद्र के स्तर से द्वीपों की रक्षा करने वाले प्रवाल एटोल के लिए खतरा पैदा होगा। कवरत्ती जैसे कुछ द्वीपों के आसपास प्रवाल भित्तियां उनकी पुनर्जनन की शक्ति को घटा रही हैं। इससे उनका अस्तित्व खतरे में आ गया है। पटेल ने कार्यभार संभालने के बाद से ही यहां पर ऐसे बदलाव करने शुरु कर दिए, जिससे इस द्वीप की मौलिकता पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है। मसौदे की बातें एक बड़े एजेंडे का हिस्सा हैं जो द्वीपों और द्वीपवासियों के लोकाचार व हितों के खिलाफ हैं।
प्रशासक इस द्वीप का विकास मालदीव मॉडल पर करना चाहते हैं। इससे पहले उन्हें दो द्वीप समूहों के बीच अंतर को देखना चाहिए। 'मालदीव मॉडल' में रिसॉर्ट्स, होटल और समुद्र तट शामिल हैं। मसौदे के प्रावधान अंधाधुंध तरीके से भवन, इंजीनियरिंग, खनन, उत्खनन व अन्य कार्यों की मंजूरी प्रदान करते हैं। किसी भी इमारत या भूमि में कोई भौतिक परिवर्तन करने या उसे उपयोग में लाने की अनुमति देते हैं। राजमार्ग आदि के लिए किसी भी भूमि का उप-विभाजन करना, यहां के छोटे द्वीपों, जिनकी लंबाई मुश्किल से 3-4 किलोमीटर से अधिक है, वह लक्षद्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा बन जाएगा।
संपत्ति का अधिग्रहण, परिवर्तन और हस्तांतरण से द्वीपवासियों को हटाने या उन्हें स्थानांतरित करने जैसी मनमानी की जा सकती है। द्वीपवासियों के लिए अपनी पैतृक संपत्ति को बनाए रखने के अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे। प्रशासन ने पहले ही स्थानीय मछुआरों के समुद्र तट, झोपड़ियां, भंडारण नौकाओं, जाल और मछली पकड़ने के अन्य उपकरणों को तोड़ दिया है। संभवतः यह पर्यटन विकास के लिए समुद्र तटों को साफ करने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
यह आरोप लगाया जा रहा है कि लोगों ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किया था। इसके लिए तटीय विनियमन क्षेत्र नियमों और तटरक्षक अधिनियम के उल्लंघन का हवाला दिया जा रहा है। प्रशासक द्वारा प्रस्तावित नियम स्थानीय द्वीपवासियों के भोजन और आहार संबंधी आदतों व धार्मिक निषेधाज्ञा को लक्षित करते हैं, जिनमें से 96.5 फीसदी मुसलमान हैं।
एलएपीआर, कानून पारित हो जाता है तो गोजातीय जानवरों की हत्या पर प्रभावी रूप से प्रतिबंध लग जाएगा। एक द्वीप के वातावरण में मवेशियों के मांस के उपभोग, भंडारण, परिवहन या बिक्री को प्रतिबंधित करना पड़ेगा। उत्तर-पूर्व के कई राज्यों और यहां तक कि पास के केरल राज्य पर भी ऐसा कोई प्रतिबंध लागू नहीं होता है। प्रशासक द्वारा द्वीपवासियों के लिए दूध का उत्पादन करने वाले सरकारी डेयरी फार्म को बंद कर दिया गया है।
पत्र में कहा गया है कि प्रशासक के विभिन्न उपाय, जिसमें तीन नए विनियमों की शुरूआत और एक मौजूदा विनियमन का संशोधन शामिल है, पूरी तरह से गलत लगता है। द्वीपों को हिंसक विकास के लिए खोलना और एक शांतिपूर्ण द्वीप पर बसने वाले समुदाय को नुकसान पहुंचाना ठीक नहीं है। पूर्व नौकरशाहों का आग्रह है कि इन उपायों को तुरंत प्रभाव से वापस लिया जाए।