आतंकी ने कहा कि इन लोगों को लखवी के बेटे कासिम की टोयोटा कार में मुजफ्फराबाद से सरवर तक पहुंचाया गया। उसने बयान में बताया कि 'हमें
एलओसी पहुंचने में दो दिन लगे, हमने उस रात बाड़ काटी और भारतीय सीमा में आ गए। हमारी मदद के लिए आए पांच अन्य लोग एलओसी से ही लौट गए। इसके बाद हमने जीपीएस की मदद से अपनी यात्रा शुरु की और भारतीय सेना की पोस्ट ढूंढी।'
जैबुल्ला ने आगे बताया कि वह लोग कुपवाड़ा के जंगलों में 15 दिनों तक छिपे रहे। कुछ स्थानीय कश्मीरियों ने उन्हें राशन भी मुहैया कराया। उसने कहा कि '12 मार्च की शाम को हम लोग अल्ताफ और बिला के घर पहुंचे। हमारे ग्रुप लीडर वकास ने उनसे दाल, बिस्किट, बर्तन और मिल्क पाउडर खरीदा और बदले में 13,000 रुपये दिए। वहां हम 6 दिन रुके। इसके बाद हम 18 मार्च को दूसरे गांव फतह खान पहुंचे, वहां के लोगों ने हमें रखने से इंकार कर दिया। लेकिन बाद में उनमें से एक ने हमें खाना और रहने की जगह दी।'
उसने आगे कहा कि 20 मार्च को सेना ने इलाके को घेर लिया और फायरिंग शुरु कर दी। उसने कहा कि 'हम सब उठ गए और अपने हथियार लेकर जंगलों की तरफ भागे। इसके बाद हम ढोक के एक घर में पहुंचे। जहां हमने उस घर के मालिक से कहा कि हम सब लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य हैं और पाकिस्तान से आए हैं। उसी जगह पर एनकाउंटर में मेरे साथी मारे गए। लेकिन मैं भागने में सफल रहा। जिसके बाद जल्द ही मुझे भी पकड़ लिया गया।'