गलवां घाटी में चीनी फौज के धोखे से लद्दाखी युवा खासे आहत हैं। उनका गुस्सा इतना ज्यादा है कि वे किसी भी तरह एलएसी यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब पहुंचना चाहते हैं। बहुत से युवा कुली बनकर अपनी यह इच्छा पूरी कर रहे हैं।
चुशुल के काउंसलर कोनचुक स्टेंजिन के मुताबिक, हमारे गांवों के युवा बहुत सीधे हैं। उनमें देशभक्ति का जज्बा कूट कूट कर भरा है। भले ही किताबी ज्ञान उनके पास नहीं हैं, लेकिन चीन के हर धोखे से वाकिफ हैं।
जब से गलवां घाटी में भारत चीन के बीच विवाद शुरू हुआ है, ये युवक गांव से गुजरने वाले सेना के काफिले के रूकने का इंतजार करते हैं। जैसे ही कोई गाड़ी रूकती है, युवक भाग कर उनसे पूछते हैं, साहब जी सब ठीक है। चीन को छोड़ना नहीं है।
हमें भी ले चलो साहब जी, अंत में युवक ये बोलना नहीं भूलते। सेरिंग वांगडू बताते हैं, इन युवाओं को सेना और बीआरओ वाले ले जाते हैं। बर्फ पर हमारे ये बच्चे जिस मेहनत से काम करते हैं, वैसा कोई दूसरा नहीं कर सकता।
पिछले दिनों सेना व दूसरे महकमे के लोग अनेक युवकों को ले गए थे। ये युवक सेना और अर्धसैनिक बलों को लॉजिस्टिक मदद देने के लिए उनके साथ रहते हैं। जहां पर सड़क नहीं होती, वहां सामान पहुंचाने के लिए इन्हीं युवाओं की मदद ली जाती है।
लद्दाखी युवकों के लिए आर्मी या आईटीबीपी अपनी तरफ से खाने का इंतजाम करती है। उन्हें बैरकों के आसपास ही ठहराया जाता है। आईटीबीपी के पूर्व डीआईजी जेवीएस चौधरी के अनुसार, लद्दाखी युवकों पर सेना एवं दूसरे बलों को सबसे ज्यादा भरोसा होता है।
इन्हें परिवार के सदस्य की तरह रखा जाता है। वे जहां पर काम करते हैं, वहां की जानकारी भी देते रहते हैं। चूंकि उनमें खुद कुछ नया समझने और जानने की लगन होती है, इसलिए वे हमारे न पूछने पर भी इलाके से जुड़ी कोई घटना बताने लगते हैं।
जब ये लोग बॉर्डर पर काम कर रहे होते हैं और किसी बात को लेकर दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने आ जाएं, तो इनका जोश देखने लायक होता है। ये अपने अपने औजारों को कंधे पर रखकर ऐसे खड़े हो जाते हैं, जैसे कमांडर का इशारा मिलते ही ये दुश्मन पर टूट पड़ेंगे।