रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के साथ पहले लद्दाख में घुसपैठ की लेकर संवाद के जरिए समाधान निकलने पर संदेह जताया था। कुछ दिन पहले रक्षा मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और सीडीएस जनरल विपिन रावत के साथ बैठक की थी। इसके बाद सीडीएस जनरल विपिन रावत ने समाधान न निकलने पर सैन्य कार्रवाई का विकल्प बताया था। सेना मुख्यालय, विदेश मंत्रालय के सूत्र भी मानने लगे हैं कि चीन गोगरा पोस्ट, डेपसांग, पैगांग त्सो लेकर, फिंगर एरिया में टस से मस नहीं हो रहा है। सूत्र बताते हैं कि चीन इन क्षेत्रों में बफर जोन बनाने का प्रस्ताव रखा रहा है और यह भारत को स्वीकार नहीं है। ऐसे में बिना अंगुली टेढ़ी किए घी निकल पाने की संभावना कम है।
भारत ने दिया जैसे को तैसा जवाब देने का संकेत
सीडीएस जनरल रावत के बयान के बाद भारतीय सामरिक हलके में हलचल काफी तेज है। कुछ रणनीतिकारों का कहना है कि भारत को यह संदेश काफी आरंभ में देना चाहिए था। लेफ्टिनेंट जनरल(रिटायर) बलवीर सिंह संधू का भी मानना है कि स्थिति लगातार जटिल होती जा रही है। वाइस एयर मार्शल(रिटा.) एनबी सिंह का कहना है कि सीडीएस जनरल रावत ने सैन्य विकल्प की बात कही है तो जरूर चीनी पक्ष से सही जवाब न आने का संकेत है। रक्षा मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार का भी कहना है कि यह जटिलताएं एक स्थानीय स्तर की झड़प की ओर ले जा रही है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि भारत कितनी सूझ-बूझ से इसे हल करता है। क्योंकि स्थानीय स्तर की सैन्य झड़प के बाद भारत और चीन के बीच युद्ध की भी संभावना प्रबल हो सकती है। एक पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल(रिटा.) का कहना है कि सीडीएस जनरल रावत सैन्य जनरल की भूमिका के बजाय राजनीतिक भूमिका वाले जनरल के रूप में ज्यादा नजर आ रहे हैं। यह बयान भी इतना देर से देने का अर्थ समझ में नहीं आया।
क्या भारत से चीन की मंशा भांपने में चूक हुई?
चीन की समाचार एजेंसी शिन्हुआ की एक खबर काफी चर्चा का विषय बनी है। 6 जनवरी 2020 को शिन्हुआ ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रेनिंग मोबलाइजेशन की अनुमति दे दी थी। यह सैन्य ट्रेनिंग तिब्बत और शिजिंयांग प्रांत में होनी थी। चीन ने इसे केन्द्र में रखकर तिब्बत और आस-पास सैन्य जमावड़ा बढ़ाना शुरू कर दिया। रणनीतिक मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि डोकलाम में झटका खाए भारत की एजेंसियों ने इसके बहुत हल्के में लिया। इस समय स्थिति यह है कि लद्दाख से सटे चीन के क्षेत्र में चीनी सेना का पूरा जमावड़ा है। सूत्र बताते हैं कि भारत की नींद पांच मई को छोटी सी सैन्य झड़प के बाद खुली। पहले से चीन की इस तैयारी पर निगाह रखी जाती और सामानांतर एहतियातन तैयारी होती तो हालात कुछ और होते। एक सामरिक विशेषज्ञ को दो बात समझ में कम आ रही है। उनका कहना है कि भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अपनी वेब साइट पर चीन की घुसपैठ को स्वीकार किया और बाद में हटा लिया। वह कहते हैं कि इसका मुझे अभी भी अर्थ कम समझ में आता है। दूसरे भारत ने चीन की फौज को वास्तविक नियंत्रण पर भेजने के लिए पहला संदेश संवाद का तथा दूसरा चीन की फौज के सामने अपनी सेना की लंबी तैनाती का संदेश दिया। सूत्र का कहना है कि चीन के सामने भारतीय सेना की तैनाती से चीन पर क्या फर्क पड़ने वाला? चीन के सैनिक तो हमारी ही जमीन में घुसपैठ करके बैठे हैं। सामने हमारे भी सैनिक बैठे रहेंगे।
सैन्य तैनाती तैयारी जारी है
रक्षा मंत्रालय से रिटायर हुए एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि कोई भी सैन्य कार्रवाई अचानक नहीं की जा सकती। इसके लिए तैयारी करनी होती है। इसके लिए समय चाहिए। संकेत भी इसी तरह के हैं। भारत ने लद्दाख क्षेत्र में यूएवी, अरली वार्निंग एयर कंट्रोल सिस्टम, आकाश प्रतिरक्षी मिसाइल प्रणाली, इग्ला एंटी एयरक्राफ्ट गन(बेसिक सुरक्षा, रेंज पांच किमी) को लद्दाख क्षेत्र में तैनात कर रखा है। नौसेना की आक्रामक बोट की तैनाती की है। यूएवी की मदद ली जा रही है और सेना ने टैंक, भारी वाहन, हॉवित्जर तोपों की तैनाती की है। माउंटेन डिविजन का मोबलाइजेशन जारी है। लॉजिस्टिक सपोर्ट को निर्वाध जारी रखने की तैयारी चल रही है और निर्धारित समय से पहले रोहतांग पास सुरंग को खोलने का प्रयास हो रहा है। सैन्य बलों ने चीन से आसन्न चुनौतियों को देखते हुए अपनी तैयारी को धार देना शुरू कर दिया है। भारतीय नौसेना ने हिन्द महासागरीय देशों से अपने संवाद बढ़ाए हैं। पूरे क्षेत्र में नौसेना लगातार उच्चस्तर की सतर्कता बरत रही है। कुल मिलाकर भारत का अब संदेश है कि शांति, सद्भाव और संवाद से रास्ता न निकले पर सैन्य कार्रवाई से गुरेज नहीं है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मंचों, संसद की रक्षा मामलों की समिति और कूटनीतिक संदेश के तरीकों में भारत ने पहले सैन्य कार्रवाई जैसी कोई आक्रमकता नहीं दिखाई है। विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि अभी भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर संवाद के जरिए शांति, सद्भाव का रास्ता विकल्प खुला रखा है।
सैन्य विकल्प में चीन के फायर पावर से टकराएगा भारत का युद्ध कौशल
भारतीय सेना की इंफैट्री यूनिट से रिटायर हुए लेफ्टिनेंट जनरल का कहना है कि बिना सैन्य टकराव के रास्ता बन जाए तो अच्छी बात है। सैन्य उपाय तो आखिरी विकल्प है। हालांकि सूत्र का कहना है कि चीन के पास भारत से अच्छा सैन्य साजो-सामान हो सकता है। टैंक, लड़ाकू विमान, मिसाइल आदि में वह ज्यादा आगे हो सकते हैं, लेकिन युद्ध हथियारों से सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के सैन्य कौशल के बल पर लड़ा जाता है। सूत्र का कहना है कि भारतीय सेना का अनुभव के लिहाज से इसमें कोई जवाब नहीं है। 1965,1971 के युद्ध में हमने इसे साबित भी किया है। पूर्व वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल पीवी नाइक हमेशा कहते हैं कि चीन का हौव्वा खत्म होना चाहिए। भारत 1962 वाला नहीं रहा। दूसरे 1962 में भारत ने वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया था। वायुसेना का इस्तेमाल हुआ होता तो नतीजा कुछ और होता। लेफ्टिनेंट जनरल(रिटा.) बलबीर सिंह संधू, मेजर जनरल(पूर्व) लखविंदर सिंह भी कहते हैं कि भारतीय सैन्य बल चीन का जवाब देने में सक्षम हैं। वाइस एयर मार्शल(पू.) एनबी सिंह कहते हैं कि चीन को मुगालते में नहीं रहना चाहिए। कोई धैर्य की परीक्षा न ले। टकराव हुआ तो चीन के फायर पावर को भारतीय सैन्य युद्ध कौशल अच्छा जवाब देगा।