एनएसओ के अनुसार इस सवाल का जवाब न सिर्फ उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को दर्शाता है बल्कि लैंगिक असमानता को भी उजागर करता है।टाइम पावर्टी का अर्थ है कि बिना वेतन वाले कार्यों के कारण अपने लिए पर्याप्त समय न मिल पाना, जिससे न केवल आत्म-देखभाल प्रभावित होती है।
समय की कमी के कारण भारतीय महिलाएं जिंदगी की रेस में पिछड़ रही हैं। अधिकांश महिलाएं अपना ज्यादातर समय घर के अवैतनिक कार्यों और परिवार की देखभाल में लगाती हैं, जिससे उनके पास वेतनभोगी नौकरियों के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके इस परिश्रम को आर्थिक मूल्यांकन में शामिल नहीं किया जाता।
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आप, अपना दिन कैसे बिताते हैं? भारत के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने जनवरी से दिसंबर 2024 के बीच देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रहने वाली 4,54,192 महिलाओं से यह प्रश्न किया। इसके परिणामों से स्पष्ट हुआ कि ‘टाइम पावर्टी’ यानी समय की कमी भारतीय महिलाओं को किस तरह प्रभावित कर रही है।
एनएसओ का अध्ययन
एनएसओ के अनुसार इस सवाल का जवाब न सिर्फ उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को दर्शाता है बल्कि लैंगिक असमानता को भी उजागर करता है।टाइम पावर्टी का अर्थ है कि बिना वेतन वाले कार्यों के कारण अपने लिए पर्याप्त समय न मिल पाना, जिससे न केवल आत्म-देखभाल प्रभावित होती है बल्कि आय के अवसर भी सीमित हो जाते हैं। जब इस अवधारणा को लैंगिक दृष्टिकोण से देखा जाता है तो यह विशेष रूप से महिलाओं के लिए एक चुनौती बनकर उभरती है।
सामने आई भारी असमानता
एनएसओ के सर्वे में पता चला कि पुरुष और महिलाएं अपने दिन के 24 घंटे कैसे बिताते हैं। इसके परिणामों ने चौंकाने वाली असमानता को उजागर किया। रोजगार और संबंधित गतिविधियों पर पुरुष अपने दिन का लगभग 61 फीसदी समय बिताते हैं जबकि महिलाएं केवल 20.7 फीसदी समय इस पर खर्च कर पाती हैं। महिलाएं अपनी कार्यक्षमता का 20 फीसदी समय वेतनभोगी कार्यों में लगाने से चूक जाती हैं।
घर के सदस्यों के लिए अवैतनिक घरेलू सेवाओं पर महिलाएं 81.5 फीसदी समय खर्च करती हैं जबकि पुरुष केवल 27 फीसदी समय खर्च करते हैं। परिवार के सदस्यों की देखभाल के लिए महिलाएं 34 फीसदी समय लगाती हैं जबकि पुरुष सिर्फ 18 फीसदी समय ऐसे कार्यों में लगाते हैं। अपने उपयोग के लिए उत्पादों के उत्पादन में महिलाएं 21फीसदी समय खर्च करती हैं, जबकि पुरुष मात्र 13 फीसदी समय खर्च करते हैं।