आम तौर पर माना जाता है कि पत्रकारिता जिसका आधुनिक संदर्भ मीडिया से है, को सबसे ज्यादा जवाबदेह जनता, अपने पाठकों और दर्शकों के प्रति होना चाहिए। कालांतर में इसमें देश भी जुड़ गया क्योंकि आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी एक तरफ सरकारों की थी तो मीडिया जो शुरुआती दौर में प्रिंट तक सीमित थी को भी देश और समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभानी थी। इसलिए उसकी जवाबदेही जनता समाज और देश के प्रति भी हो गई।
इन नवोदित पत्रकारों की बेचैनी इस बात पर है कि इन दिनों मीडिया अपने ही प्रति जवाबदेह नहीं रह पा रहा है, जबकि उसे सबसे पहले खुद के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा, तभी वह जनता, अपने दर्शकों और पाठकों व देश के प्रति जवाबदेह हो सकता है। युवा मन की इस बेचैनी की एक झलक मिली हाल ही में पुणे में हुई राष्ट्रीय मीडिया कांफ्रेंस में जब दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, नागपुर और देश के अन्य हिस्सों से इसमें शामिल हुए मीडिया दिग्गजों को तमाम मीडिया संस्थानों के करीब 1500 छात्रों के साथ लगातार दो दिनों तक हुए संवाद में तीखे और बेचैन करने वाले सवालों का सामना करना पड़ा।
छात्रों के सवालों के जवाब मंच से वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने-अपने हिसाब से दिए, लेकिन कई बार इन युवाओं के सवालों पर उन्हें रक्षात्मक भी होना पड़ा।
लगभग मीडिया कुंभ की तर्ज पर हुए इस सम्मेलन में मीडिया को लेकर इतनी लंबी और सार्थक चर्चा देश में हाल के वर्षों में शायद लंबे समय बाद हुई, जितनी कि 21 और 22 सितंबर को लगातार दो दिन तक पुणे के एमआईटी वर्ल्ड पीस केंद्र परिसर में हुई। इसमें देश भर के 80 से ज्यादा मीडिया दिग्गजों ने हिस्सा लिया और मीडिया के करीब-करीब सभी आयामों पर लंबी चर्चा की। इनमें प्रिंट, टीवी, डिजिटल और सोशल मीडिया और मीडिया प्रबंधन समेत सभी विधाओं से जुड़े लोग शामिल हुए।
चर्चा के दौरान श्रोताओं में मौजूद पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन के छात्रों, जिनमें एमआईटी पुणे के साथ साथ मुंबई, नागपुर, ग्वालियर, भोपाल समेत कई अन्य मीडिया संस्थानों के छात्र भी शामिल थे, ने मौजूदा दौर में मीडिया के रवैए पर तीखी टिप्पणियों वाले सवाल दागे। छात्रों ने पूछा कि इन दिनों मीडिया ने देश और सरकार को पर्यायवाची क्यों बना दिया है।
छात्रों ने पूछा कि पत्रकार अब पार्टी प्रवक्ताओं की तरह क्यों बर्ताव करने लगे हैं और क्यों सरकार से सवाल पूछने की जगह विपक्ष से सवाल ज्यादा करने लगे हैं। छात्रों ने खबरों की गुणवत्ता और उनके चयन को लेकर भी तीखे सवाल किए। पूछा कि कई बार महत्वपूर्ण घटनाएं मीडिया में जगह क्यों नहीं पातीं जबकि सरकारी और प्रचारात्मक खबरें पूरे दिन चलती रहती हैं। मीडिया क्यों कुछ चुनींदा नेताओं के हर भाषण और हर कार्यक्रम का लाईव कवरेज करता है, जबकि उसी वक्त देश में कई बड़ी घटनाएं जो जनता से जुड़ी होती हैं, उनको कोई जगह नहीं मिलती।
छात्रों ने पूछा कि किसी बड़े नेता या सिलेब्रेटी की मौत या शादी को पूरे दिन इस तरह क्यों दिखाया जाता है कि जैसे देश में और कोई घटना ही नहीं हो रही है। छात्रों ने पूछा कि सोशल मीडिया पर तो फेक न्यूज और मार्फ फोटो व वीडियो की भरमार रहती है, जिससे लोगों में भ्रम फैलता है और कई बार हिंसा व दंगे भी हो जाते हैं, लेकिन क्यों मुख्यधारा का मीडिया भी अफवाहों और फेक न्यूज को रोकने की बजाय दिखाता है, क्या टीआरपी के लिए ऐसा किया जाता है।
छात्रों ने कहा कि देशहित समाज हित से भी ऊपर टीआरपी है। छात्रों ने पूछा कि क्यों टीवी चैनल दिन रात हिंदू-मुस्लिम विवाद और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव भड़काने वाली बहसें चलाते रहते हैं।
छात्रों ने यह भी पूछा कि क्या भारत पाकिस्तान के बीच तनाव और आतंकवाद को लेकर पैदा हुई समस्या का हल युद्ध से ही मुमकिन है। छात्रों का कहना था कि अगर मीडिया के आधार पर जनमत बने तो यही लगता है। छात्रों ने उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार पर इन दिनों मीडिया की खामोशी या एसे मामलों की अनदेखा पर भी सवाल उठाए। छात्रों का कहना था कि पहले टीवी चैनलों और अखबारों में जितनी खोजी रपटें होती थीं, अब वो क्यों नहीं देखने को मिलती हैं।
जबकि सोशल मीडिया में और कई डिजिटल वेब साइट्स में तमाम ऐसी खबरें और जानकारियां आती रहती हैं, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया क्यों उन्हें विस्तार से जगह नहीं देता। छात्रों का सवाल था कि इतिहास के साथ जिस तरह इन दिनों छेड़छाड हो रही है, मीडिया उस पर चुप क्यों है।
यह सवाल भी उठा कि 70 साल में देश में कुछ भी नहीं हुआ, इस विमर्श की पड़ताल मीडिया क्यों नहीं करता। यह सवाल भी आया कि देश के महापुरुषों को लेकर दिए जाने वाले अनर्गल बयानों और उनकी छवि खराब करने के प्रयासों के खिलाफ मीडिया क्यों नहीं आगे आता। एक सवाल यह भी आया कि अगर विपक्ष जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप सरकार पर लगाता है, तो मीडिया इसकी पड़ताल करते हुए दूध का दूध और पानी का पानी क्यों नहीं करता। सम्मेलन में ऐसे चुभने वाले तीखे सवालों की बौछार वक्ताओं पर लगातार पड़ी और कोशिश हुई कि युवा मन के इन सवालों के जवाब भी दिए जाएं।
लेकिन ईमानदारी से अगर कहा जाए तो छात्रों के सवाल वक्ताओं पर भारी पड़े और इससे एक संकेत भी मिला कि देश की युवा पीढ़ी मीडिया की बदलती भूमिका को लेकर बेहद गंभीर है और उसके मन में कई सवाल हैं जिनका जवाब उसे चाहिए।
मीडिया एवं पत्रकारिता पर हुए इस प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन का जिसका आयोजन एमआईटी (महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी) पुणे ने किया था, का फोकस विश्व शांति में मीडिया और पत्रकारिता की भूमिका पर था। इस विषय पर अपने तरह का संभवत यह पहला आयोजन था, जिसमें पत्रकारिता और मीडिया को लेकर उसके विभिन्न आयामों और उनसे जुड़े मुद्दों पर विस्तृत विचार विमर्श हुआ।
इस आयोजन के लिए एमआईटी समूह के संस्थापक अध्यक्ष डा. विश्वनाथ कराड़ और उनके पुत्र व समूह के कार्यकारी निदेशक राहुल विश्वनाथ कराड़ निश्चति रूप से बधाई और साधुवाद के पात्र हैं। दोनों ने ही न सिर्फ पूरे समय सम्मेलन में बैठ कर सभी वक्ताओं को पूरे मनोयोग से सुना बल्कि इस बात का पूरा ध्यान रखा कि आयोजन में किसी तरह की कोई कमी न रह जाए।
स्वभाव से अध्यात्मिक और समाजसेवी विश्वनाथ कराड़ का कहना है कि इस आयोजन के पीछे उनकी मूल प्रेरणा है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया और पत्रकारिता के सामने बढ़ती चुनौतियों पर विमर्श के लिए एक खुला और बड़ा राष्ट्रीय मंच तैयार करना, जहां आकर देशभर के पत्रकार और मीडिया संस्थानों से जुड़े लोग उन मुद्दों पर खुलकर चर्चा कर सकें, जिन पर मीडिया के भीतर भी मंथन होता रहता है। वहीं इस आयोजन की धुरी राहुल कराड़ के मुताबिक यह पहला राष्ट्रीय मीडिया और पत्रकारिता सम्मेलन एक प्रयोग है, जिसे वह चाहते हैं कि स्थाई वार्षिक आयोजन बने, जहां हर साल मीडिया जगत के लोग आकर खुली चर्चा करें।
आने वाली चुनौतियों का मुकाबल कैसे किया जाए इस पर बात हो। मीडिया संस्थानों में अध्ययन कर रहे नए और युवा पत्रकारों के साथ वह अपने अनुभव साझा करके उन्हें परिपक्व बना सकें। राहुल कराड़ का सपना है कि इस मंच को एक बड़ा राष्ट्रीय मंच का स्वरूप देकर पत्रकारिता और मीडिया के उन छात्रों जो सामाजिक आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनकी सहायता की जा सकें जिससे वह अपनी शिक्षा प्राप्त कर सकें।